Tuesday, August 15, 2017

स्माईली का सवाल है !

अच्छा आपने बदलाव बहुत बात सुनी होंगी पर क्या इस बदलाव को महसूस किया है स्मार्ट फोन और इंटरनेट कितना तगड़ा बदलाव हमारे जीवन के हर पहलू में ला रहे हैं .कुछ का पता हमें पता पड़ता और कुछ का बिलकुल भी नहीं ,पीसीओ और साईबर कैफे इतिहास हैं हर हाथ में इंटरनेट बोले तो स्मार्टफोन जो भरे हुए हैं दुनिया भर के एप्स से . पहले भारत के एक सामान्य  इंसान का अगर तकनीक से बहुत पाला पड़ता था तो दो चीजें थी पहला कैलकुलेटर और दूसरा टाईपराईटर. तकनीक हमारी जिंदगी का कितना अहम हिस्सा होती जा रही है.ये तकनीकी बदलाव हमारे बात चीत करने की एक नयी वर्तनी गढ़ रहे हैं कितने नए शब्द मिल गए हैं हमें. थोडा सा डूड बनकर चलते हैं बाजार  घूमने  और देखते हैं इस नयी दुनिया में  लोग कैसे बोल बतिया रहे  हैं उप्प्स चैट कर रहे  हैं.यार् पिज्जा खाना है नॉट वरी चिलेक्स मुझे गूगल करने दे अभी बताता हूँ कि कौन सा पिज्जा आउटलेट करीब है.नेट स्लो है सेम ओल्ड कनेक्शन प्रोब्लम, क्या तू अभी एस एम् एस में अटका है,फैंक दे इस फ़ोन को कोई बजट स्मार्ट फोन ले ले.देख इंसान स्मार्ट हो न हो पर गैजेट स्मार्ट होने चाहिए. ये तो एक बानगी भर है वर्च्युल वर्ल्ड की बातें रीयल वर्ल्ड में कितनी तेजी से हमसे जुड़ती जा रही हैं. तू मेरा कैसा दोस्त है जो प्रोफेशनल लाइकर्स की तरह मेरी हर बात में हाँ हाँ किये जा रहा है तेरा भी कोई पॉइंट ऑफ व्यू है कि नहीं लाईफ का एक्टिव यूजर्स बन बिंदास कमेन्ट कर. यहाँ प्रेमी प्रेमिका भी कुछ ऐसी ही रौ में बहे चले जा रहे हैं उधर वो  चैट पर जल रही होती कभी हरी तो कभी पीली और इधर वो, तो बस लाल ही होता हूँ.तुम एक स्माइली भी नहीं भेज सकती,तुम बिजी हो तो मैं कौन सा हैबीटुएटेड चैटर हूँ और सुनो चैटर हो सकता हूँ चीटर नहीं.अब जवाब भी सुनिए वो भी कम दिलचस्प नहीं है काश तुम टाईम लाइन रिव्यू  होते जब चाहती  अनटैग कर देती  है. बाप बेटे की रोड पर होती तकरार का आप भी लुत्फ़ लीजिए.तुम इतनी रात तक चैट की बत्तियों को जलाकर किसको हरी झंडी दिखाते रहते हो.क्या पापा ऐसा कुछ भी नहीं है मैं तो बस फोन पर ही ऑनलाइन रहता हूँ.बेटे बाप हूँ तेरा मैं इन्विजीबल रहकर तेरी हर हरकत पर नजर रखता हूँ ये लड़कियों का चक्कर छोड़ पढ़ाई पर ध्यान लगा नहीं तो जिंदगी तुझे ब्लॉक कर देगी तब तू बस लोगों को फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजता फिरेगा और लोग तुझे वेटिंग में डालते रहेंगे. अगर आपको ये लेख पसंद आया हो तो मुस्कुराईयेगा जरुर आखिर एक स्माईली का ही तो सवाल है .
प्रभात खबर में 15/08/17 को प्रकाशित 

Saturday, August 12, 2017

वेब पर कैसे निखरें भारतीय भाषाएँ

इंटरनेट ने सही मायने में भारत को एक ग्लोबल विलेज के रूप में तब्दील कर दिया है|लम्बे समय तक भाषा एक बड़ी समस्या थी अगर आपको अंग्रेजी नहीं आती तो इंटरनेट पर आप सिर्फ तस्वीरें ही देख सकते थे पर स्पीच रिकग्नीशन टूल और यूनीकोड फॉण्ट ने वह समस्या भी दूर कर दी आपको बस अपने कंप्यूटर या स्मार्ट फोन  में कुछ सोफ्टवेयर या एप डाउनलोड करना है और आप इंटरनेट के विशाल सागर में गोते लगाने के लिए तैयार हैं वह भी अपनी भाषा में  |पर इंटरनेट में कुछ क्षेत्र अभी भी ऐसे हैं जहाँ बाजार न होने के कारण उसमें शोध और उन्नयन उस गति से नहीं हुआ जितना अंग्रेजी भाषा के साथ हुआ और यूनिकोड फॉण्ट उनमें से एक ऐसा ही क्षेत्र है |यूनिकोड फॉण्ट ऐसे फॉण्ट होते हैं कि उनमें लिखने पढने के लिए आपको अलग से उस फॉण्ट विशिष्ट को डाउनलोड करने की जरुरत नहीं होती और यह फॉण्ट इंटरनेट को सपोर्ट करते हैं |इंटरनेट में हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ  का विस्तार इसी फॉण्ट के ज़रिये लगातार गति पा रहा है पर यूनिकोड फॉण्ट की शैली में शब्दों के भावों को वयक्त करने के लिए जो विशिष्टता और विविधता हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओँ के फॉण्ट में होनी चाहिए हिन्दी के पारम्परिक फॉण्ट  (चांदनी ,कुर्ती देव ,खलनायक आदि ) के मुकाबले में वह नहीं है और इसी कारण हिन्दी की तमाम वेबसाईट प्रस्तुतीकरण में एक जैसी ही  दिखती है  और अगर इसकी तुलना अंग्रेज़ी के फॉण्ट से  की जाए तो हिन्दी के यूनीकोड फॉण्ट कहीं नहीं ठहरते पर तथ्य यह भी है कि हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं ने अंग्रेजी को भारत में इंटरनेट प्रयोगकर्ता भाषा के रूप में पहले ही दूसरे स्थान पर ढकेल दिया  है | गूगल और के पी एम् जी की रिपोर्ट के मुताबिक इंटरनेट पर भारतीय भाषाओँ के साल 2011 में 42 मिलीयन प्रयोगकर्ता थे जो साल 2016 में बढ़कर 234 मिलीयन हो गए हैं और यह सिलसिला लगातार बढ़ ही रहा है पर फॉण्ट की विविधता और वैशिष्ट्य  में अंग्रेजी अभी भी कहीं आगे है|ये फॉण्ट ही हैं जो वेबसाईट्स के कंटेट की द्र्श्यता में विविधता लाते हैं |जो पाठकों से विश्वास का सम्बन्ध बनाते हैं |पाठक उनके फॉण्ट से वेबसाईट का नाम तक पहचान लेते हैं |हिन्दी के ज्यादातर अखबार मुद्रित माध्यम में अपने लिए एक अलग प्रकार का फॉण्ट इस्तेमाल करते हैं पर मुद्रित माध्यम में वे पारम्परिक फॉण्ट का इस्तेमाल करते हैं और यूनिकोड फॉण्ट का छपाई में इस्तेमाल न के बराबर होता है |अंग्रेज़ी के फॉण्ट इस तरह की किसी भी सीमा से मुक्त हैं यानि जो फॉण्ट छपाई में इस्तेमाल होता है वही वेबसाईट या कंप्यूटर में भी इस्तेमाल किया जा सकता है |
लाखों करोडो वेबसाईट में फॉण्ट कंटेंट के प्रस्तुतीकरण के  नजरिये से अहम् भूमिका निभाते हैं |ऐसा ही कुछ अखबारों के साथ भी होता है पर वहां हिन्दी के पारम्परिक फॉण्ट इस्तेमाल किये जाते हैं जिनमें यूनीकोड के मुकाबले ज्यादा विविधता है पर इंटरनेट पर हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओँ की वेबसाईट फॉण्ट के नजरिये से एकरसता लिए हुए दिखती हैं |यूनीकोड फॉण्ट में विविधता की कमी के कारण मीडिया के अन्य माध्यमों जैसे समाचार पत्र ,फिल्म और टेलीविजन में यूनीकोड फॉण्ट का इस्तेमाल न होकर हिन्दी के पारम्परिक फॉण्ट का इस्तेमाल होता है जिनका प्रयोग करना यूनीकोड के मुकाबले कठिन होता है और इसके लिए जिस भाषा का वह फॉण्ट है आपको उस भाषा की पारम्परिक टाइपिंग आनी आवश्यक है | जबकि यूनीकोड इस तरह की समस्याओं से परे  है आप जो कुछ भी किसी भारतीय भाषा में कहना चाह रहे हैं आपको उसे बस रोमन में लिखना होता है और वह उस भाषा में अपने आप परिवर्तित हो जाता है पर अब भारतीय भाषाओँ के यूनिकोड फॉण्ट में भी बदलाव दिख रहा है और उसका बड़ा कारण हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ  का बढ़ता आधार है  |इंटरनेट पर 55.8 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी में हैजबकि दुनिया की पांच प्रतिशत से भी कम आबादी अंग्रेजी का इस्तेमाल अपनी प्रथम भाषा के रूप में करती है। इसके बरक्स अरबी या हिंदी जैसी भाषाओं मेंजो दुनिया में बड़े पैमाने पर बोली जाती हैंइंटरनेट सामग्री क्रमश: 0.8 और 0.1 प्रतिशत उपलब्ध है। बीते कुछ वर्षों में इंटरनेट और कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स जिस तरह लोगों की अभिव्यक्ति व अपेक्षाओं का माध्यम बनकर उभरी हैंवह उल्लेखनीय जरूर है|एक टाईप” ग्रुप  के पंद्रह लोगों की टीम ने भारतीय भाषाओँ के लिए छ: ऐसे यूनिकोड फॉण्ट विकसित किये हैं जो भारत की क्षेत्रीय भाषाओँ को एक ही तरीके से लिखे जा सकते हैं  इस ग्रुप के द्वारा विकसित मुक्ता देवनागरी फॉण्ट प्रधानमंत्री कार्यालय समेत लगभग पैतालीस हजार वेबसाईट के द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है |इसी का बालू फॉण्ट दस भारतीय भाषाओँ में उपलब्ध है जिनमें मलयालम,कन्नड़ और उड़िया जैसी भाषाएँ शामिल हैं |फॉण्ट संदेश प्रसार में कुछ ऐसा ही काम करते हैं जैसे आवाज का इस्तेमाल बोलने में होता है फॉण्ट शब्द के भावों को पाठकों तक ले जाते हैं और हर भाव के लिए एक ही फॉण्ट संदेश की गुणवत्ता को प्रभावित करता है |आज की पीढी इतना ज्यादा वक्त कम्प्यूटर पर बिता रही है तो पाठन एक अच्छे अनुभव में तब्दील होना चाहिए |
हिन्दी में शुरुवात में यूनिकोड फॉण्ट के लिए मंगल ही एक विकल्प हुआ करता था पर धीरे धीरे उसका यह एकाधिकार टूटा |एरियल यूनिकोड फॉण्ट के आने से हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ के फॉण्ट में एकरसता को विराम मिला है पर एरियल यूनीकोड  विंडोस टेन ऑपरेटिंग सिस्टम पर ही चलेगा और मंगल विंडोस सेवन पर   |गूगल के यूनिकोड में बत्तीस फॉण्ट हैं पर उसकी तकनीकी सीमायें हैं वो क्रोम पर ही काम करेंगे |मैक ऑपरेटिंग सिस्टम का देवनागरी फॉण्ट गूगल को सपोर्ट नहीं करेगा |बड़े संस्थान अपने लिए बाजार में विशेषीकृत यूनिकोड फॉण्ट पैसे देकर विकसित करा सकते हैं पर ऐसे में वो छोटे वेब प्रकाशक पिछड़ जाते हैं जो सीमित संसाधनों में अपनी वेबसाईट चला रहे हैं और उन्हें ओपन सोर्स के मुफ्त फॉण्ट पर निर्भर रहना पड़ता है जो अंग्रेजी के मुकाबले बहुत ही कम हैं |
जिसतरह भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ रहा था उस गति से हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ की वेबसाईट की डिजाइन और प्रस्तुतीकरण में वैविध्य का अभाव दिखता था उम्मीद की जानी चाहिए कि यूनीकोड फॉण्ट के ओपन सोर्स  में शुरू हुआ यह प्रयास जारी रहेगा और हिन्दी समेत अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में भी कंटेंट के साथ फॉण्ट में भी विविधता बढ़ती जायेगी |
नव भारत टाईम्स में 11/08/17 को प्रकाशित 

Tuesday, July 11, 2017

उम्र के इस पड़ाव पर

बचपन,जवानी ,और बुढ़ापा जीवन के ये तीन हिस्से माने गए हैं ,बचपन में बेफिक्री जवानी में करियर और बुढ़ापा मतलब जिन्दगी की शाम पर जीवन में एक वक्त ऐसा आता है जब न बचपने जैसी बेफिक्री रहती है न जवानी में
करियर जैसा कुछ  बनाने की चिंता और न ही अभी जिन्दगी की शाम हुई होती है यानि बुढ़ापा |शायद यही है अधेड़ावस्था जब जिन्दगी में एक ठहराव होता है पर यही उम्र का वो मुकाम है जब मौत सबसे ज्यादा डराती है |
उम्र के इस  पड़ाव पर जो कभी हमारे बड़े थे धीरे धीरे सब जा रहे हैं और हम बड़े होते जा रहे हैं पर मुझे इतना बड़प्पन नहीं चाहिए कि हमारे ऊपर कोई हो ही न | मुझे अच्छी तरह याद है बचपन के दिन जब मैंने होश सम्हाला ही था कितने खुशनुमा थे बस थोड़ा बहुत इतना ही पता था कि कोई मर जाता है पर उसके बाद कैसा लगता है उसके अपनों को ,कितना खालीपन आता है जीवन में इस तरह के न तो कोई सवाल जेहन में आते थे और न ही कभी ये सोचा कि एक दिन हमको और हमसे  जुड़े लोगों को मर जाना है  हमेशा के लिएमम्मी पापा का साथ दादी –बाबा  का सानिध्य,लगता था जिन्दगी हमेशा ऐसी ही रहेगी|सब हमारे साथ रहेंगे और हम सोचते थे कि जल्दी से बड़े हो जाएँ सबके साथ कितना मजा आएगा पर बड़ा होने की कितनी बड़ी कीमत हम सबको चुकानी पड़ेगी इसका रत्ती भर अंदाज़ा नहीं था | मौत से पहली बार वास्ता पड़ा 1989 में बाबा जी का देहांत हुआ |
जल्दी ही हम सब अपनी जिन्दगी में रम गए| जिन्दगी अपनी गति से चलती रही तीन साल बाद फिर गर्मी की छुट्टियों में दादी की मौत देखी वह भी अपनी आँखों के सामने |मुझे अच्छी तरह से याद है वह गर्मियों की अलसाई दोपहर थी उस सुबह ही जब मैं सुबह की सैर के लिए निकल रहा था दादी अपने कमरे में आराम से सो रही थीं ,मुझे बिलकुल अंदाजा नहीं था कि अगली सुबह वह अपने बिस्तर पर नहीं बर्फ की सिल्लियों पर लेटी होंगीं , जीवन की क्षण भंगुरता का सच में पहली बार एहसास हुआ दादी जल्दी ही यादों का हिस्सा बन गयीं |हम भी आगे बढ़ चले |जिन्दगी खुल रही थी ,भविष्य ,करियर ,परिवार के कई पड़ाव पार करते हुए जिन्दगी को समझते हुए बीच के कुछ साल फिर ऐसे आये जब हम भूल गए कि मौत सबकी होनी है |  बाबा की मौत के बाद से किसी अपने के जाने से उपजा खालीपन लगातार बढ़ता रहा हम जवान से अधेड़ हो गए और माता –पिता जी बूढ़े जिन्दगी थिरने लग गयी | आस –पास से अचानक मौत की ख़बरें मिलनी  बढ़ गईं हैं पड़ोस के शर्मा जी हों या रिश्तेदारी में दूर के चाचा- मामा जिनके साथ हम खेले कूदे बड़े हुए  धीरे –धीरे सब जा रहे हैं सच कहूँ तो उम्र के इस पड़ाव पर अब मौत ज्यादा डराती है |
प्रभात खबर में 11/07/17 को प्रकाशित 

Saturday, July 1, 2017

एक क्लिक में मनपसन्द खाना

इंटरनेट पर्याप्त रूप से हमारी संस्कृति को प्रभावित कर रहा है और यह कार्य इतनी तेजी और शांति से हो रहा है कि हम समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या वाकई इंटरनेट इतना ताकतवर है आप इसे एप कल्चर भी कह सकते हैं जब संस्कृति का जिक्र हो तो उसमें इंसानी रहन सहनखान पान और परिधान अपने आप समावेशित हो जायेंगे |रहनसहन और परिधान के लिए पहले ही हजारों एप बाजार में आ चुके हैं और भारतीय उनका इस्तेमाल भी खूब कर रहे हैं पर इसी क्रम में खान पान भी शामिल हो चुका है|बाहर जाकर खाना खाने का दौर भले ही खत्म न हुआ हो पर मद्धिम जरुर पड़ रहा है अब लोग ऑनलाईन ऑर्डर करना ज्यादा पसंद कर रहे हैं और इसमें माध्यम बन रहे हैं खान पान से जुड़े एप जिनकी सहायता से आप अपना मनपसन्द खाना मंगा सकते हैं |वैश्विक शोध संस्था रेड सीर के आंकड़ों के अनुसार भारत में ऑनलाईन फ़ूड डिलीवरी बाजार  साल 2016 में डेढ़ सौ प्रतिशत की दर से बढ़ा  है वर्तमान में यह बाजार तीन सौ मिलीयन डॉलर का है |बाजार के इस बड़े हिस्से पर कब्ज़ा ज़माने की रणनीति के तहत गूगल और उबर जैसे बड़े वैश्विक इंटरनेट खिलाड़ी भी कूद पड़े हैं |गूगल ने ऑनलाईन खान पान के इसी बाजार पर  कब्जे  लिए एरियो एप लांच किया है जो  रेस्टोरेंट डिलीवरी और होम सर्विस प्लेटफोर्म सेवाएँ उपलब्ध करा रहा है  अभी  इस एप की सुविधा का लाभ हैदराबाद और मुंबई के निवासी ही उठा पा रहे हैं शीघ्र ही भारत के अन्य शहरों के निवासी इस सुविधा का लाभ उठा पायेंगे |उबर ने भी इसी साल  उबर ईट्स के नाम से एक एप सेवा भारत में भी शुरू की है  जिसकी सेवाएँ फिलहाल अभी मुम्बई में ही उपलब्ध हैं |
बदल रहा है सामाजिक ताना –बाना
एप आधारित ऑनलाईन की ये खान पान सेवाएँ भविष्य की और इशारा कर रही हैं कि किस तरह इंटरनेट हमारे जीवन के हर पहलू को हमेशा के लिए बदल डालने वाला है |संयुक्त परिवारों का पतन ,महिलाओं का कार्य क्षेत्र में बढ़ता दखल,शिक्षा के लिए घर से बाहर निकलते युवा  और शहरीकरण ऐसे कुछ कारक हैं जिन्होंने एक आदर्श भारतीय परिवार के ताने बाने पर असर डाला है |महिलाओं ने रसोईघर की देहरी को लांघ कर कम्पनी के बोर्ड रूम में अपनी जगह बनाई है जिससे यह धारणा टूटी है कि पुरुष कमाएगा और महिलायें खाना बनायेंगी |बढ़ता आय स्तर ,एकल और छोटे परिवारों ने जहाँ पति पत्नी दोनों काम करते हैं जैसे कुछ ऐसे कारक रहे हैं जिन्होंने ऑनलाईन खान पान के इस कारोबार को बढ़ावा देना शुरू किया है इसमें जहाँ एक तरफ अनेक  तरह के  खाने का लुत्फ़ मिलता है जिसमें फास्ट फ़ूड भी शामिल हैं वहीं अपने घर का आत्मीय वातावरण लोगों को ऑनलाईन खाना ऑर्डर करने के लिए प्रेरित करता है जिसके साथ आपको ऑनलाईन खरीददारी में कई तरह के डिस्काउंट भी मिलते हैं |ऑनलाईन खान पान एक पूर्णता शहरी प्रवृत्ति है और अभी भारत के टाईप टू और टाईप थ्री शहर इससे अछूते हैं इसलिए जैसे जैसे शहरीकरण बढेगा इस व्यवसाय को और पंख लगेंगे |दूसरा शहर बहुत तेजी से आकार में बढे हैं वहीं ट्रैफिक और पब्लिक ट्रांसपोर्ट की हालत बदतर हुई है ऐसे में बाहर जाकर खाने का विकल्प बड़े शहरों में  एक मध्यवर्ग परिवार या व्यक्ति के लिए एक महंगा और त्रासद पूर्ण अनुभव में तब्दील हो जाता है |तुलनात्मक रूप से ऑनलाइन खाने का ऑर्डर इन सब शहरी समस्याओं से बचाता है जिसमें ट्रैफिक में लगने वाला समय और पेट्रोल और टैक्सी पर किया गया व्यय शामिल है |
चुनौतियाँ भी है और कई
दुनिया में सबसे ज्यादा युवा आबादी वाले देश में चीन के बाद सबसे ज्यादा स्मार्ट फोन हैं और यही वो मैदान है जो दुनिया भर के लोगों को नवाचार करने के लिए आकर्षित कर रहा है |साल 2015 से  कई स्टार्ट अप इस क्षेत्र में शुरू हुए जिसमें ज़ोमेटोस्विगी ,फ़ूड पांडा जैसी कम्पनियां शामिल हैं जिन्होंने एप आधारित खान पान की सेवाएँ देनी शुरू कीं हालंकि व्यवसायिक रूप से यह कम्पनिया कोई ख़ास मुनाफा अभी तक कमा नहीं पायीं हैं और बाजार में जमे रहने के लिए संघर्षरत हैं| उबर की प्रतिद्वन्दी कम्पनी ने ओला  ने एक साल के भीतर ही अपनी ऐसी ही सेवा ओला कैफे भारत में बंद कर दी |पर गूगल और उबर जैसी कम्पनियों के मैदान में उतरने से मामला बहुत दिलचस्प हो गया है वो भी ऐसे वक्त में जब इस क्षेत्र में स्टार्ट अप की संख्या में गिरावट देखी जा रही है इन कम्पनियों का इस क्षेत्र में निवेश यह दिखाता है कि भारत एक नयी तरह के फ़ूड रिवोल्यूशन के लिए तैयार हो रहा है  |जाहिर है इसकी शुरुआत पिज्ज़ा और बर्गर जैसी फास्ट फ़ूड बेचने वाली कम्पनियों से हुई और इस प्रयोग की सफलता ने पूरे के पूरे रेस्टोरेंट को ऑनलाईन बनाने के लिए प्रेरित किया |यह कहना अभी जल्दीबाजी होगी कि ऑनलाईन खान पान के  इस  कारोबार का भविष्य उज्जवल है क्योंकि भारतीय रुचियाँ   भोजन के मामले में दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले अलग हैं इसका बड़ा कारण देश के खान पान में पर्याप्त विविधता होना जिसका एक बड़ा कारण जलवायु आधारित भोजन है जहाँ जिस चीज की प्रचुरता है वही वस्तु उस क्षेत्र के लोगों द्वारा सामान्य रूप से भोजन के इस्तेमाल में ज्यादा प्रयोग में लाई जाती है उत्तर भारत में जहाँ सरसों का तेल अधिक इस्तेमाल होता हैं वहीं दक्षिण भारत में नारियल का तेल |
शहरीकरण ने विस्थापन को पर्याप्त रूप से बढ़ावा दिया है और लोग देश के एक हिस्से से दूसरे  हिस्से में रोजगार के लिए जा रहे हैं और बस भी रहे हैं  पर खाने के मामले में उन्हें स्थानीय खानों पर ही निर्भर रहना पड़ता है क्योंकि वही सस्ते पड़ते हैं क्या ओनलाईन फ़ूड डिलीवरी बाजार  उनकी इस कमी को पूरा कर पायेगा इस प्रश्न का उत्तर समय के गर्भ में है  |
नवभारत टाईम्स में 01/07/17 को प्रकाशित 

Wednesday, June 28, 2017

स्मार्टफोन ने कम कर दिए साइबर चोरी के रास्ते

बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब लोग ब्रांडेड कंप्यूटर खरीदने  की बजाय उसे एसेम्बल करवाना ज्यादा पसंद करते थे और ज्यादातर कंप्यूटर सोफ्टवेयर पाइरेटेड होते थे |धीरे –धीरे तकनीक ने पैठ बनाई और लोग भी जागरूक हुए वहीं सोफ्टवेयर निर्माताओं ने भी जेनुइन सॉफ्टवेयर खरीदने वालों को प्रोत्साहित करने के लिए अपने सोफ्टवेयर की कीमतें कम कीं | एंटी पाइरेसी तकनीक बनाने वाली कम्पनी मूसो के एक शोध के मुताबिक सारी दुनिया में पाइरेसी साईट पर जाने वाले लोगों की संख्या में पिछले साल के मुकाबले छ प्रतिशत की गिरावट आयी है |इसका एक कारण नेटफ्लिक्स जैसी वीडियो कंटेंट उपलब्ध कराने वाली वेबसाईट का आना भी है जो दुनिया के चार देशों को छोड़कर हर जगह अपनी सेवाएँ दे रही हैं और दूसरा हॉट स्टार जैसे वीडियो एप की सफलता है |  
सारी दुनिया में पाइरेसी एक बड़ी समस्या है और इंटरनेट ने इस समस्या को और भी जटिल बना दिया है सोफ्टवेयर पाइरेसी से शुरू हुआ यह सफर फिल्म, संगीत धारावाहिकों तक पहुँच गया है |मोटे तौर पर पाइरेसी से तात्पर्य किसी भी सोफ्टवेयर ,संगीत,चित्र और फिल्म  आदि के पुनरुत्पाद से है जिमसें मौलिक रूप से इनको बनाने वाले को कोई आर्थिक लाभ नहीं होता और पाइरेसी से पैदा हुई आय इस गैर कानूनी काम में शामिल लोगों में बंट जाती है |इंटरनेट से पहले यह काम ज्यादा श्रम साध्य था और इसकी गति धीमी थी पर इंटरनेट ने उपरोक्त के वितरण में बहुत तेजी ला दी है जिससे मुनाफा बढ़ा है |भारत जैसे देश में जहाँ इंटरनेट बहुत तेजी से फ़ैल रहा है ऑनलाईन पाइरेसी का कारोबार भी अपना रूप बदल रहा है |पहले इंटरनेट स्पीड कम होने की वजह से ज्यादातर पाइरेसी टोरेंट से होती थी पर टोरेंट वेबसाईट पर विश्वव्यापी रोक लगने से अब भारत में पाइरेसी का चरित्र बदल रहा है क्योंकि अब हाई स्पीड इंटरनेट स्मार्टफोन के जरिये हर हाथ में पहुँच रहा है तो लोग पाइरेटेड कंटेंट को सेव करने की बजाय सीधे इंटरनेट स्ट्रीमिंग सुविधा से देख रहे हैं |ऑनलाइन पाइरेसी में मूलतः दो चीजें शामिल हैं पहला सॉफ्टवेयर दूसरा ऑडियो -वीडियो कंटेंट जिनमें फ़िल्में ,गीत संगीत शामिल हैं |सॉफ्टवेयर की लोगों को रोज –रोज जरुरत होती नहीं वैसे भी मोटे तौर पर काम के कंप्यूटर सोफ्टवेयर आज ऑनलाईन मुफ्त में उपलब्ध हैं या फिर काफी सस्ते हैं पर आज की भागती दौडती जिन्दगी में जब सारा मनोरंजन फोन की स्क्रीन में सिमट आया है और इन कामों के लिए कुछ वेबसाईट वो सारे कंटेंट उपभोक्ताओं को मुफ्त में उपलब्ध कराती हैं और अपनी वेबसाईट पर आने वाले ट्रैफिक से विज्ञापनों से कमाई करती हैं पर जो कंटेंट वे उपभोक्ताओं को उपलब्ध करा रही होती हैं वे उनके बनाये कंटेंट नहीं होते हैं और उस कंटेंट से वेबसाईट जो लाभ कमा रही होती हैं उसका हिस्सा भी मूल कंटेंट निर्माताओं तक नहीं जाता है |ऑडियो –वीडियो कंटेंट को मुफ्त में पाने के लिए लाईव स्ट्रीमिंग का सहारा लिया जा रहा है क्योंकि इंटरनेट की गति बढ़ी है और उपभोक्ता को बार –बार कंटेंट बफर नहीं करना पड़ता यानि अभी सेव करो और बाद में देखो वाला वक्त जा रहा है |यू ट्यूब जैसी वीडियो वेबसाईट जो कॉपी राईट जैसे मुद्दों के प्रति जरुरत से ज्यादा संवेदनशील है पाइरेटेड वीडियो को तुरंत अपनी साईट से हटा देती है पर इंटरनेट के इस विशाल समुद्र में ऐसी लाखों वेबसाईट हैं जो पाइरेटेड आडियो वीडियो कंटेंट उपभोक्ताओं को उपलब्ध करा रही हैं | मुसो की ही रिपोर्ट के मुताबिक पाइरेसी के लिए जिस तकनीक का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है उसमें स्ट्रीमिंग पहले नम्बर पर है जिसका कुल पाइरेसी में योगदान लगभग बत्तीस   दशमलव पांच प्रतिशत है दूसरे नम्बर पर पब्लिक टोरेंट उसके बाद वेब डाउनलोड ,प्राइवेट टोरेंट और स्ट्रीम रिपर्स शामिल हैं |भारत जैसे देश जो पाइरेसी की समस्या से लगातार जूझ रहे हैं वहां नेट की उपलब्धता का विस्तार पाइरेसी की समस्या को पूरी तरह से ख़त्म तो नहीं कर सकता पर कम जरुर करेगा क्योंकि भारत में डेस्कटॉप के मुकाबले स्मार्टफोन की संख्या लगातार बढ़ रही है |रिपोर्ट के मुताबिक़ विश्व में ऑनलाइन पाइरेसी शामिल चौसठ प्रतिशत लोग डेस्कटॉप कंप्यूटर के माध्यम से  पाइरेसी साईट पर जाते हैं वहीं मोबाईल फोन से इन साईट्स पर जाने वाले लोगों की संख्या मात्र पैंतीस प्रतिशत है |
हिन्दुस्तान में 28/06/17 को प्रकाशित लेख 

हम मानने को तैयार नहीं

जीवन के  दो युग आमने सामने हैं|मेरा चौदह वर्षीय बेटा अक्सर शीशे के सामने खड़ा होकर अपने आप को निहारा करता है अपनी उगती हुई हल्की दाढ़ी पर हाथ फेर कर पूछता है मैं कब शेव करूँगा ?और उसी वक्त मैं भी उसी शीशे के सामने अपने बचे हुए बालों को समेटते हुए उनको रंगने की जद्दोजहद में लगा रहता हूँ जिससे अपनी बढ़ती उम्र को छुपा सकूँ |बाल तो ठीक है पर पकी हुई दाढी को कितना भी क्यों न रंग लो एक दो बाल छूट ही जाते हैं जो आपकी बढ़ती हुई उम्र की चुगली कर ही देते हैं |मैं और मेरा बेटा उम्र के एक ऐसे ही दौर से गुजर रहे हैं जहाँ हम जो हैं वो मानने को तैयार नहीं है वो अब किशोरावास्था में है जब बच्चों के लिए बड़ा हो गया है और जवानों के लिए बच्चा ही है |उसका बाप यानि मैं अपनी जवानी की उम्र छोड़ आया है पर बुढ़ापा अभी आया नहीं है दोनों उम्र के जिस मुकाम पर हैं उसे बदलना चाहते हैं |मैं अपने सफ़ेद बालों को काले रंग से जिससे लोग मुझे अधेड़ न मानें और बेटा जल्दी से जल्दी दाढी उगा कर बड़ा हो जाना चाहता है | एक आगे निकल जाना चाहता है और एक पीछे लौटना चाहता है | दोनों ही दौर थोड़े मुश्किल होते हैं पर जहाँ किशोरवस्था में सपने  उम्मीदें और आने वाले एक बेहतर कल का भरोसा होता है वहीं चालीस पार का जीवन थोडा परेशान करता है |जिन्दगी का मतलब रिश्तों के साथ से होता है पर उम्र के इस पड़ाव पर इंसान का सबसे पहला करीबी रिश्ता  टूटता है यानि माता –पिता या तो वो जा चुके होते हैं या उम्र के ऐसे मुकाम  पर होते हैं जब कभी भी कोई बुरी खबर आ सकती है | जिन्दगी में एक अजीब तरह की स्थिरता आ चुकी होती है (अपवादों को छोड़कर) जहाँ से आप आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि आप कितनी दूर और जायेंगे |इस चालीस पार के जीवन में वो बातें अब अजीब लगती हैं जिनका हमने खुद अपने चौदह पार के जीवन (किशोरावस्था ) में बड़े मजे से लुत्फ़ उठाया था जैसे जोर जोर से गाने सुनना और बार –बार शीशे में चेहरा देखना |बेटे को जल्दी है ये समय जल्दी से बीत जाए और वो बड़ा हो जाए |मैं समय को रोक देना चाहता हूँ ताकि कुछ समय और मिल जाए |इन दिनों मुझे लखनऊ के शायर मीर अनीस साहब का एक शेर ज्यादा याद आता है “दुनिया भी अजब सराय फानी देखी,हर चीज यहाँ की आनी जानी देखी,जो आके ना जाये वो बुढ़ापा देखा,जो जाके ना आये वो जवानी देखी |
प्रभात खबर में 28/06/17को प्रकाशित 

Tuesday, June 27, 2017

सिक्किम यात्रा :अंतिम भाग

रिम्बी फाल 
पीलिंग की अगली सुबह कंचनजंघा पर्वतमाला में सूर्योदय के साथ शुरू हुई |सिर्फ चिड़ियों की चहचाहट और कोई मशीनी शोर नहीं ऐसी सुबह का आनन्द दशकों बाद उठाया था |गर्म पानी से नहाने के बाद एक बार फिर स्थानीय पर्यटन शुरू जो होना था |गाडी में कुछ दूर चलते ही पता लगा सडक पर जाम लगा पीछे गाड़ियों का काफिला बढ़ता ही गया पता चला आगे सडक पर बनाने का काम चल रहा है पर मजाल है किसी गाडी में हॉर्न की आवाज सुनाई पडी हो लगभग आधे घंटे के बाद सडक थोड़ी देर के लिए खोली गयी और हमारी गाडी उस जाम में से निकल गयी |अगला पड़ाव था रिम्बी फाल या रिम्बी जलप्रपात वैसे सच बताऊँ तो सिक्किम झरनों का प्रदेश है आप सडक से कहीं की भी थोड़ी दूरी की यात्रा कीजिये आपको किसी न किसी पहाड़ से कोई झरना गिरता जरुर दिखेगा हाँ ये जरुर हो सकता है कि आकार में जो झरने के मानक हैं वो उस पर खरा न उतरे पर पानी पहाड़ों से गिरता आपको यत्र –तत्र दिख ही जाएगा तो रिम्बी झरना बस आकार में थोडा बड़ा है इसलिए वह एक पर्यटक स्थल बन गया है पर यहाँ के पर्यटक स्थल पर आपको स्थानीय लोग नहीं दिखेंगे और न ही भीड़ भाड़ रहती है गंदगी का नामों निशाँ नहीं है हाँ और जो गंदगी दिखेगी वो बाहर से आये पर्यटकों का छोड़ा हुआ सामान होगा |मतलब आम सिक्किम का निवासी पर्यवरण के प्रति खासा जागरूक है |रिम्बी फाल्स में ऐसा कुछ नहीं था जो अनोखा हो एक झरना जो काफी उंचाई से गिर रहा था पूरा का पूरा वातावरण प्रक्रतिक था और कोई भी मानवीय ढाँचे का निर्माण वहां नहीं किया गया था |यहीं रास्ते में दरप गाँव पड़ता है जहाँ बड़ी ईलायची की खेती होती है और कई सारे होम स्टे हैं जहाँ आप घर के वातावरण में रहकर पीलिंग की खूबसूरती का आनंद ले सकते हैं और ये होटल के मुकाबले सस्ते पड़ते हैं पर होटल की लक्जरी आपको नहीं मिलेगी जो कुछ मिलेगा वो सब प्राकृतिक होगा |
सिक्किम का संतरे का बाग़ 
अब बारी थी सिक्किम का एक बाग़ देखने की थी यूँ तो बाग़ में देखने कुछ होता नहीं पर यह सिक्किम का एक संतरे का बाग़ था |घुमावदार सीढीयों में तरह -तरह के पेड़ पौधे और उनके पीछे एक पहाडी नदी कल कल बह रही थी |संतरे का मौसम न होने के कारण हमें संतरे के छोटे -छोटे कच्चे फलों को देखकर दिल को खुश करना पड़ा जो भी हो पार्क था बहुत लुभावना |
इसके और आगे एक प्रमुख झील का भी दर्शन करना था जो पहाड़ों की तलहटी में स्थित है जिसका नाम खेतोपलारी झील था |इस झील के पहुँचने का रास्ता बहुत संकरा और वीरान है अगर गाड़ियों की आवा जाही न हो तो यह कह पाना बहुत मुश्किल है कि यहाँ बौद्ध धर्म से संबंधित इतना महतवपूर्ण केंद्र होगा जो हिन्दुओं  द्वारा भी पूजनीय है ऐसा माना जाता है कि यहाँ लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं |यह झील करीब पैंतीस सौ साल पुरानी है जहाँ कुछ बौद्ध मठ हैं जहाँ पूजा हो रही थी |
खेतोपलारी झील
प्राकृतिक तौर पर यह इलाका पर्याप्त जैव विविधता लिए हुए था रास्तों और पहाड़ों पर जमी हुई काई बता रही थी कि यहाँ बारिश का पानी सूखने नहीं पाता कारण चारों तरफ ऊँचे ऊँचे पेड़ों का होना जो सूर्य की किरणों को धरती पर आने से रोक लेते हैं इसीलिये झील से मुख्य मार्ग का रास्ता जो करीब एक किलोमीटर का था ठंडा और फिसलन भरा था जबकि बाहर सूर्य अपनी तेजी के साथ विराजमान था |दोपहर के बारह चुके थे अब हमें पीलिंग वापस लौटना था और वहां से दार्जिलिंग के लिए प्रस्थान करना था |
करीब एक घंटे के बाद हम दार्जिलिंग के रास्ते में थे पीलिंग से दार्जिलिंग तक की दूरी करीब चार घंटे में पूरी होनी थी इस यात्रा के शुरू होने से पूर्व ही दार्जिलिंग में तनाव शुरू हो गया था और हम निश्चिन्त नहीं थे कि हम दार्जिलिंग पहुँच पायेंगे भी या नहीं खैर उस दिन हमें बताया गया कि दार्जिलिंग में सब ठीक थे और आप दार्जिलिंग जा सकते हैं |वैसे एक बात बताऊँ जिन्दगी में घूमने का सिलसिला बड़ी देर से शुरू हुआ पर जब से मैंने होश सम्हाला अगर कहीं जाने का मन होता था तो वह दार्जीलिंग ही था शायद इसके लिए वे हिन्दी फ़िल्में जिम्मेदार थी जो उन दिनों दूरदर्शन पर दिखाई जाती थीं तो मन बल्लियों उछल रहा था कि आखिरकार मेरे जीवन की यह अधूरी इच्छा भी पूरी होने वाली है |सिक्किम पश्चिम बंगाल द्वारा प्रशासित स्वायत्तशासी क्षेत्र है जो सिक्किम से एक दम सटा हुआ है और इस क्षेत्र के अधिकतर निवासी नेपाली मूल के हैं जोअपने लिए अलग राज्य गोरखा लैंड की मांग लम्बे समय से कर रहे हैं |सिक्किम राज्य तक को सडक बहुत अच्छी है पर जहाँ से सिक्किम खत्म होता है और पश्चिम बंगाल की सीमा शुरू होती है रास्ता वहीं से खराब होना शुरू हुआ और जिसका चरम था दार्जिलिंग से पहले के पंद्रह किलोमीटर का रास्ता उस पहाडी रास्ते में आपको सडक खोजनी पड़ेगी |
दार्जिलिंग पीस पगोड़ा
थोड़ी देर समतल इलाके में चलने के बाद एक बार फिर हमारी गाडी पहाडी पर चढ़ने लगी |आस-पास के चाय बागान बता रहे थे हम दार्जिलिंग आ चुके थे पर शहर अभी थोड़ी दूरी पर था |
यार्ड में खड़ी टॉय ट्रेन 
शहर में घुसने पर दार्जिलिंग को लेकर जो मेरे सपने थे वो धीरे धीरे ध्वस्त होने शुरू हुए |काफी गन्दा शहर लोगों और गाड़ियों से भरा हुआ जैसे गर्मियों में शिमला और मंसूरी का हाल होता है लेकिन शहर में तनाव साफ़ महसूस किया जा सकता था जगह –जगह सेना और पुलिस की मौजूदगी यह बता रही थी कि सब ठीक नहीं है |हमारा ड्राइवर जिसका नाम मैं भूल चुका हूँ दार्जिलिंग की समस्या के बारे में बता रहा था और अभी जो आग भड़की है उसके पीछे ममता बनर्जी सरकार का बंगाली भाषा को अनिवार्य बनाने का तुगलकी फैसला था पर इसी के साथ अलग राज्य की मांग भी जोर पकड़ गयी जिससे हिंसा होने लग गयी |सच बताऊँ तो दार्जिलिंग को देखकर यह अहसास हुआ कि मैं यहाँ दोबारा नहीं आना चाहूँगा |अतिक्रमण और अनाधिकृत निर्माण ने पहाड़ों को बर्बाद कर दिया है हर जगह पर्यटकों की भीड़ और गंदगी |शाम हो चुकी थी इसलिए अब आराम का वक्त था वैसे भी सुबह साढ़े तीन बजे उठकर टाइगर हिल पर सूर्योदय देखने जाने का कार्यक्रम था हालंकि मेरी इसमें कोई रूचि नहीं थी पर एक बार फिर जनमत के फैसले के आगे झुकना पड़ा |
टाइगर हिल से सूर्योदय 
सुबह साढ़े तीन बजे दार्जिलिंग में ठीक ठाक ठण्ड थी हम टाइगर हिल जाने के लिए निकल पड़े |गाड़ियों और लोगों का हुजूम धीरे –धीरे बढ़ता गया उस जगह जहाँ से सूर्योदय का नजारा किया जाना था सुबह के चार बजे एक छोटा मोटा बाजार लगा था जहाँ ऊनी कपडे बिक रहे थे और हैरत की बात है लोग खरीद भी रहे थे |कुछ युवतियां थर्मस में कॉफ़ी बेच रही थी मैंने एक कोट डाल रखा था पर ठण्ड से बचने के लिए कॉफ़ी एक अच्छा विकल्प था बीस रुपये में एक छोटे से कागज के कप में कॉफ़ी मिली जो मीठी ज्यादा थी |आसमान का माहौल देखकर मैंने अंदाजा लगा लिया आज सूरज नहीं दिखेगा क्योंकि आसमान में बादल थे तो कंचनजंघा की चोटियों में से आज सूरज के दर्शन न हो पायेंगे इसलिए मैं वहां से पहले ही खिसक लिया और मेरा यह निर्णय सही साबित हुआ क्योंकि उस दिन सूरज नहीं निकला  और हम सूर्योदय के बाद गाड़ियों की होने वाली भागम भाग और जाम से बचकर पहले निकल गए |लौटते वक्त बतासिया लूप मेमोरियल पार्क का भ्रमण किया गया |
बतासिया वार मेमोरियल :फोटो साभार गूगल 
बतासिया लूप दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे का एक स्टेशन है जहाँ एक वार मेमोरियल भी बनाया गया है जहाँ गोरखा रेजीमेंट के  उन सारे जवानों के नाम अंकित  है जो 1987 के बाद वीरगति को प्राप्त हुए |बतासिया लूप एक ऐसा स्टेशन है जहाँ रेलवे की पटरियां अंगरेजी का आठ बनाती हैं |अब कुछ बातें दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के बारे में दार्जिलिंग को विकसित करने का श्रेय अंग्रेजों  को जाता है यहाँ 1881 से नेरो गेज की ट्रेन अभी भी चलती है जिसे यूनेस्को की तरफ से वर्ल्ड हेरीटेज का दर्जा मिला है यह दो तरह के रास्ते पर चलती है पहला दार्जिलिंग से घूम स्टेशन जिसका आनंद जयादातर पर्यटक उठाते हैं इसे टॉय ट्रेन के नाम से जाना जाता है पर इसका किराया बहुत मंहगा है और दूसरा दार्जिलिंग से सिलीगुड़ी जिसमें यह ट्रेन सत्तर किलोमीटर का रास्ता यह ट्रेन करीब आठ घंटे में पूरा करती है |सडक से सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग का रास्ता बहुत अच्छा होने के कारण यह दूरी अब तीन घंटे में सिमट गयी है इसलिए लोग अब ट्रेन को प्राथमिकता नहीं देते ऐसे पर्यटक जिनके पास समय है और प्रकृति से प्यार वही अब इस ट्रेन से दार्जिलिंग तक का सफ़र तय करते हैं वैसे लम्बे समय तक यह टॉय ट्रेन मुम्बईया फिल्मों का हिस्सा रही है |आराधना फिल्म का वह मशहूर गाना “मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू” कौन भूल सकता है जो इसी ट्रेन पर शूट हुआ है |हम इस ट्रेन को चलता हुआ न देख पाए क्योंकि दार्जिलिंग में तनाव के कारण यह ट्रेन बंद थी हां यार्ड में जाकर जरुर इस ट्रेन को निहारा जो पिछले सौ सालों से भी ज्यादा दार्जिलिंग के जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बनी हुई है |
पटरियों पर सजा बाजार 
ट्रेन के मुख्य ट्रैक पर यहाँ मेक शिफ्ट अरेंजमेंट वाली कई दुकानें भी हैं जो ट्रेन के आने पर बंद हो जाती हैं और जाने के बाद फिर खुल जाती हैं |बतासिया लूप पर सस्ते उनी कपडे आप खरीद सकते हैं |
होटल लौट कर थोडा सुस्ताने के बाद हम जापान सरकार द्वारा निर्मित पीस पेगोडा देखने गये तब तक बादल पूरे दार्जिलिंग को अपने जद में ले चुके थे और ऐसे मौसम में किसी पेगोडा को देखना उसकी सार्थकता सिद्ध कर रहा था शान्ति निस्तब्धता और प्रकृति का साथ |हम उसकी खूबसूरती में खोये ही थे तभी मेरी तन्द्रा को एक बुरी खबर ने तोडा शहर में हड़ताल हो गयी हम लोगों को तुरंत होटल लौटना होगा |लौटते वक्त वो दार्जिलिंग जो भीड़ और गाड़ियों से भरा था एकदम खाली हो गया हम जल्दी से होटल पहुंचे |बंद इतना जबरदस्त था कि हमारे होटल भी ताला पड़ा हुआ था हम लोगों के पहुँचने पर गेट खुला और फिर ताला बंद हो गया |अब दार्जिलिंग घूमने का सारा कार्यक्रम मुल्तवी होकर इस पर केन्द्रित था कि सुरक्षित वापस बागडोगरा कैसे पहुंचा जाए जहाँ से हमारी उड़ान अगले दिन थी पूरी दोपहर टैक्सी के जुगाड़ में बीत गयी करते –करते शाम को पांच बजे हम लोग दार्जिलिंग से सिलीगुड़ी के लिए निकले और रात आठ बजे सिलीगुड़ी पहुँच गये |एक यात्रा अपने अंत की तरफ थी पर जिन्दगी की यात्रा और भटकन अभी भी जारी है किसी नए पड़ाव के इन्तजार में |
सिक्किम पर प्रख्यात निर्देशक सत्यजीत रे द्वारा बनाया गया वृत्तचित्र देखना चाहें तो यहाँ क्लिक करें |

 समाप्त 



सिक्किम यात्रा :पांचवां भाग

विदा गंगटोंक
अब गंगटोक से स्थायी रूप से विदा लेने की बारी थी सामान समेट कर गाड़ियों में भरा गया अब अगला ठिकाना पीलिंग था जहाँ हमें एक रात बितानी थी और पीलिंग घूमते हुए अगली शाम को ग्रेजिंग होते हुए दार्जिलिंग के लिए निकल जाना था |पीलिंग गंगटोंक से ज्यादा उंचाई पर है |पीलिंग की उंचाई 2,150 मीटर है और गंगटोंक से लगभग एक सौ तेरह किलोमीटर दूर है जहाँ पहुँचने में लगभग पांच घंटे लगने की उम्मीद थी |पीलिंग अपनी आबोहवा और सुन्दर दृश्यों के लिए मशहूर है |सुबह सात बजे के करीब हमने अपना होटल छोड़ दिया |धीरे –धीरे गंगटोंक पीछे छूट गया और अब हम थे और हरे भरे पहाड़ आधा रास्ता वही था जिन रास्तों में हम पिछले दो दिन से आ जा रहे थे पर उसके बाद सब कुछ बदल जाने वाला था |रास्ता लम्बा था इसलिए मेरी नजर पर सडक पर चल रही गतिविधियों पर थी |हम लगभग जंगल में चल रहे थे पर बीच-बीच  में अपनी एक मोटरसाइकिल के साथ पुलिस कभी कभार दिख जाती थी इसमें ख़ास बात यह थी कि इनमें ज्यादातर महिलाएं थी जो उस वीराने में बगैर किसी भय के अपनी ड्यूटी बजा रही थी न बैठने के लिए कुर्सी न आस –पास कोई आबादी पर वो मुस्तैद थीं |मैंने कहीं पढ़ा था हमें वैसी पुलिस मिलती है जैसा हमारा समाज होता है सच है सिक्किम का समाज डरा हुआ नहीं था और नियम को मानने वाला भी |उत्तर भारत में दिन के समय भी कोई जगह लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं है पर यहाँ कोई समस्या नहीं है |
बुद्ध की एक सौ तीस फीट ऊँची मूर्ति 

स्कूल जल्दी ही बंद होने वाले थे यहाँ गर्मियों की छुट्टियाँ बारिश में शुरू होती हैं इस वक्त परीक्षा का मौसम चल रहा था रास्ते में दो तीन के झुण्ड में लड़के लड़कियां अपना प्रश्न पत्र और क्लिप बोर्ड लिए आते जाते दिख रहे थे |इस वीराने में जहाँ गाड़ियाँ भी ज्यादा नहीं चल रही थी वो आराम से हँसते खेलते हुए अपनी मंजिल की तरफ बढे जा रहे थे |रास्ते में पड़ने वाले गाँवों में आबादी ज्यादा नहीं थी पर एक चीज जो मुझे बार –बार मोहित कर रही थी यहाँ की लड़कियों के चेहरे पर छाई मुस्कान, इतनी अलहड़ और उन्मुक्त मुस्कान जिस पर मोहित हुए बगैर  नहीं रहा जा सकता |उनके पहनावे से यह अंदाजा लगाया जा सकता था कि यहाँ लड़कियों के पहनावे से उनके चरित्र की पहचान नहीं होती है हम नेशनल हाइवे से गुजर रहे थे और रास्ते में पड़ने वाली दुकानों में ज्यादातर लड़कियां ही थीं जो शॉर्ट्स और टी शर्ट में बड़े आराम से अपनी दुकान के सामने  बैठी थी या ग्राहकों को सामान बेच रही थी बगैर किसी हिचक के पूरे आत्मविश्वास के |
सूना पेट्रोल पम्प और पीछे कंचनजंघा की चोटियाँ 
यह मामला बता रहा है सिक्किम का समाज लैंगिक समानता के मामले में उत्तर भारत के अन्य राज्यों से कहीं आगे है |हम सिंगतम पार कर रहे थे यहाँ के पहाडी रास्तों की एक ख़ास बात मुझे समझ आयी कि क्यों यहाँ छोटी गाड़ियाँ भी बहुतायत से चलती हैं वो यह था कि आम तौर पर पहाड़ों पर एक तरफ पहाड़ होता है और दूसरी तरफ गहरी खाई जिसमें दुर्घटना होने पर गाडी कई फीट नीचे खाई में गिरती है अगर गाडी छोटी होती है तो जान जाने या चोटिल होने की आशंका रहती है पर सिक्किम के पहाड़ और यहाँ के रास्ते इस मायने में उत्तर भारत के पहाड़ों से अलग हैं यहाँ जिस तरफ खाई है उस तरफ भी बहुत पेड़ पौधे हैं जिससे गाड़ियों के नीचे गिरने का खतरा कम रहता है और अगर गिरी भी तो वो ज्यादा नीचे नहीं जा पाएंगी क्योंकि पहाड़ पर दूसरी तरफ भी बहुत से पेड़ हैं जिनमें साल और बांस की बहुतायत है |पहाड़ पूरी  तरह से यहाँ संजोये गए हैं और विकास का वह रोग अभी यहाँ नहीं पहुंचा है |सिक्किम में सीढ़ीदार खेतों में खेती होती है जिनमें बड़ी इलायची और संतरा प्रमुख हैं |खेतों में यूरिया का इस्तेमाल नहीं होता और सरकार भी ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देती है इसलिए यहाँ आपको खाने के लिए जो कुछ मिलेगा वह शुद्ध ही मिलेगा |प्रदुषण न होने से शुद्धता का स्तर कई गुना बढ़ जाता है |रास्ते में हमारे ड्राइवर ने बताया कि  रवानगला कस्बे में एक बुद्ध पार्क पड़ता है|बस  उसको देखने की इच्छा बलवती हो उठी गाडी घुमवाई गयी |एक सौ तीस फुट ऊँची बुद्ध की प्रतिमा दूर से ही दिखती है |
पीलिंग की वो सुहानी शाम 
बादलों की आवा जाही के बीच जब हम उस पार्क में पहुंचे तो बुद्ध प्रतिमा बादलों की छाँव में थी और हल्की बूंदा बांदी हो रही थी पर धीरे धीरे बादल चले गए और सूरज चमकने लग गया यह भी जल्दी बना पार्क है जिसका उदघाटन 2013 में बौद्ध गुरु दलाई लामा ने किया |मूर्ति के अन्दर पुजाग्रह है और इसके अंदर चलते चलते मूर्ति के सर तक पहुँच सकते हैं |जहाँ महात्मा बुद्ध के जीवन के कहानी को विशाल चित्रों में उकेरा गया है |शान्ति और शानदार मौसम यहाँ आप तन और मन से उस परालौकिक शक्ति से एकाकार हो सकते हैं |कई लोग वहां ध्यान कर रहे थे कुछ सो भी रहे थे ऐसा मुझे लगा हो सकता है वो ध्यान ही कर रहे हों पर हमारे पास इतना समय नहीं था इसलिए जल्दी ही हमने उस पार्क से विदा ली |करीब दिन के दो बजे हम पीलिंग के अपने होटल में पहुँच गए |पहली नजर में पीलिंग ने मुझे कुछ ख़ास आकर्षित नहीं किया हो सकता हो ये सफर की थकान हो या कुछ और उस वक्त धूप भी थी हमने फटाफट अपने कमरे में कब्ज़ा जमाया और एक चाय पी| यहाँ चाय के पाउच और बिजली की केतली हर होटल के कमरे में मिलेगी तो आपको बस पानी गर्म करना है और चाय कॉफ़ी जो पीना चाहें पीयें |कुछ देर सुस्ताने के बाद मैंने आस पास नजर डालने के लिए कमरे की खिड़की खोली थी तो देशी भाषा में अलबला गये इतने सुंदर द्रश्य की कल्पना नहीं की थी 

मेरे कमरे से बाहर का नजारा 
मेरे  पीछे हिमालय और आगे कंचनजंगा की चोटियाँ थी |मैंने सोचा जरा नहा कर सफर की थकान उतारी जाए पर पानी इतना ठंडा था कि हिम्मत जवाब सी देती दिखी लेकिन मैंने हथियार नहीं डाले और नहाया वो बात अलग है कि उस ठन्डे पानी से नहीं बल्कि गीजर के गर्म पानी से अब शाम गहरा रही थी और मैं पीलिंग की सड़कों पर था |मौसम का आलम यह था कि मुझे कोट डालना पड़ा सड़कें लोगों से भरी थी कुछ विदेशी भी थे पर शोर नाम की कोई चीज नहीं सब कुछ शांत मोटे तौर पर अगर लोगों को बदल दिया जाए तो मुझे एकबारगी लगा मैं यूरोप की किसी गली में घूम रहा था |एक स्थानीय निवासी से बात करने पर पता चला यहाँ कुछ भी नहीं है बस मौसम के कारण सैलानी आते हैं तो आपको सिर्फ होटल ही मिलेंगे पर पीलिंग की वो शाम आज भी मेरे जेहन में जीवंत है पहाड़ जब धीरे धीरे हरे से काले होते जा रहे थे सड़कों पर गाड़ियों की हेडलाईट चमक रही थीं और मैं जून के महीने में कोट डाले हुए देश के एक ऐसे हिस्से में जहाँ मैं अजनबी था यूँ ही भटक रहा था |भटक ही तो रहा हूँ और शायद तभी भटकते हुए पीलिंग आ पहुंचा |मै सडक की रौशनी से दूर जाकर उन काले पहाड़ों को देख रहा था जो न जाने क्या क्या अपने अंदर समेटे हुए हैं |उस रात मैंने आईपोड को स्पीकर मोड में डाला और अपने कान के पास रखकर सोया शायद  सत्तर के दशक के उन मधुर गानों की स्वर लहरी में हिमालय और कंचनजंघा के वो पहाड़ भी सोये होंगे जो सदियों से जग रहे हैं

सिक्किम यात्रा ;चौथा भाग

बादल पर पाँव है 
हम लोगों को नामची जाना था यह तो पता था पर वहां है क्या इसकी जानकारी किसी को भी ठीक ठाक नहीं थी |छान्गू झील के कार्यक्रम में परिवर्तन होने के कारण यह वैकल्पिक व्यवस्था थी खैर मुझे इससे मतलब नहीं था कि वहां क्या होगा मैं तो देश के पूर्वोत्तर भाग के इस हिस्से की हरियाली को अपनी आँखों में भर लेना चाहता था ये बात अलग है कि सावन का महीना दूर था |तिस्ता एक बार फिर हमारा साथ दे रही थी |बीच बीच में बारिश हो रही थी सूरज का नामोनिशान नहीं था |रास्ते बादलों से भरे हुए थे |हमारी गाडी जब उनके बीच से गुजरती थी तो एक ठंडा सा अहसास होता है |प्रार्थना झंडियों से भरे रास्ते हमें याद दिला रहे थे यहाँ प्रकृति से बड़ा कोई नहीं है |
सड़क किनारे लगी प्रार्थना झंडियाँ 
रंग बिरंगी प्रार्थना झंडियाँ जहाँ पूजा की प्रतीक थीं वहीं सफ़ेद झंडियाँ शोक और म्रत्यु का |सच है पहाड़ लोगों को धीरज धरना सिखा देते हैं तभी शायद देश के इस हिस्से में सब कुछ शांत थमा है सब अपनी बारी का इन्तजार करना जानते हैं किसी को किसी से आगे जाने की कोई जल्दी नहीं है वो चाहे गाड़ियाँ हों या इंसान, उत्तर भारत के मैदानी इलाकों की तरह बात –बात में प्रतिक्रिया नहीं देते शायद उनको मालूम है जन्नत की हकीकत |मैं शान्ति से सडक पर गाड़ियों का अनुशासन देख रहा था सामने वाली गाडी को पास देना ,उस पहाडी मोड़ पर जब दो गाड़ियाँ अगल –बगल होती हैं दोनों ड्राइवरों का हँसते मुस्कुराते हुए हाल चाल लेना बता रहा था ये देश का वह हिस्सा नहीं है जहाँ मैं रहता हूँ हाँ यह देश का वह हिस्सा जरुर है जहाँ कोई भी शांति से जीना चाहेगा बगैर किसी को हराए हुए जीतना चाहेगा |पहाड़ आपको जीना सिखा देते हैं मैं सोच रहा था वैसे भी जब आपके हाथ में कुछ न हो तो आप अपने आप धीरज धरना सीख जाते हैं यहाँ के निवासियों को यह भ्रम नहीं है कि वे शक्तिशाली है यहाँ कोई शक्तिशाली है तो वह सिर्फ और सिर्फ प्रकृति है |रास्ता कहीं अच्छा और कहीं बहुत खराब है जगह –जगह सडक बनाने का काम चल रहा था |तीन घंटे की यात्रा के बाद हम नामची पहुंचे |
सर्वेश्वर धाम परिसर 
नामची इलाका गंगटोक की तरह विकसित और साफ़ सुथरा था उसके तीन किलोमीटर के बाद हमारी मंजिल थी जिसके बारे में हमें सिर्फ इतना पता था कि कोई पूजा स्थल है पर वह किस धर्म का है हमें नहीं पता था |गाडी पार्किंग में लगी हमें ड्राइवर ने कहा आप लोग सामने चले जाइए कुछ सीढियां चढ़ कर हम एक विशाल परिसर में पहुंचे पर अभी भी कुछ समझ में नहीं आ रहा  था |सुरक्षा जांच के बाद आगे बढे एक आदमकद भगवान शिव की प्रतिमा दिखी मन में एक निराशा सी आयी मतलब एक मंदिर जिसका कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं है ये दिखाने इतनी दूर लाये |

प्रकृति का साथ 
मंदिर तो हमारे इलाके में बहुत से हैं इसी उधेड़बुन में उस सुरक्षा जांच के क्षेत्र से बाहर निकले जहाँ भगवान शिव की वह मूर्ति लगी हुई थी, पर अब जो हमारे साथ होने वाला था वो न भूतो न भविष्यति वाला मामला था हम जैसे ही बाहर निकले तो लगा जैसे हमारे सारे भ्रम दूर किये जा रहे हैं कोई पर्दा खुल रहा हो दूर एक विशाल शिव जी की मूर्ति दिखी |इतनी विशाल हिन्दू देवता की मूर्ति मैंने अभी तक नहीं देखी थी हाँ बुद्ध जी की विशाल प्रतिमाएं मैंने खूब देखी थी |मैं एकटक उसको देखते हुए आगे बढ़ रहा हूँ मूर्ति  के चारों ओर मंदिर ही मंदिर रामेश्वर का भी मंदिर भी वहां दिख रहा था पर मैं तो सिक्किम में हूँ यहाँ कैसे यह मंदिर ?
एक सौ आठ फीट ऊँची मूर्ति सर्वेश्वर धाम 
सवाल ही सवाल जैसे जैसे मैं आगे बढ़ रहा था धरती का कैनवास बड़ा होता जा रहा था |सबसे पहले मैं अपने सारे सवालों का जवाब चाहता था पर मेरी पत्नी दर्शन करना चाहती थी पर उसी वक्त उस परिसर के समस्त मंदिरों के आधे घंटे के लिए बंद होने का समय हो चुका था इसलिए मेरे पास अपने सारे सवालों का जवाब पाने का मौका था |मैंने एक गार्ड को भरोसे में लिया और उससे कुछ पता किया शोफोलोक पहाडी पर बने इस विशाल मंदिर की आधारशिला साल 2005 में रखी गयी और साल 2013 में इसे लोगों के लिए खोल दिया गया जिसका उद्घाटन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने किया |शिव जी की मूर्ति की उंचाई एक सौ आठ फीट है और यहाँ देश के बारह ज्योतिर्लिंग और चार धाम के सभी मंदिरों की प्रतिकृति बनाई गयी है मकसद इतना है जो लोग अपने जीवन में इन मंदिरों में न जा पायें वे यहाँ आकर उनके दर्शनों का लाभ उठा सकें |हमें लग ही नहीं रहा था कि हम किसी  मंदिर परिसर  में है चारों ओर शांति पहाड़ बादल भीड़ के नाम पर लोगों के कुछ झुण्ड और कुछ भी नहीं ,किसी तरह के पंडों का कोई आतंक नहीं हमने शान्ति से उस पूरे परिसर का जायजा लिया |
सर्वेश्वर धाम की यह फोटो गूगल के सौजन्य से 
मैंने न तो चार धाम देखें हैं न ही बारह ज्योतिर्लिंग इसलिए मेरे लिए एक विजुअल ट्रीट जैसा मामला हो गया |प्रतिक्रतियां  इतनी शानदार है कि आप धोखा खा सकते हैं कि  ये असल है या नकल वैसे भी सिक्किम में बौद्ध धर्म ज्यादा प्रचलित है इसलिए मोनेस्ट्री के प्रदेश में इतना शानदार मंदिर मन को लुभा रहा था जहाँ  धर्म के नाम पर कोई लूट नहीं थी जहाँ प्रसाद के दुकानों की भरमार नहीं थी जो आपसे कुछ खरीदने के लिए कह रही हों |इस परिसर में बैठकर प्रकृति से एकाकार हो सकते हैं कहने को यह धार्मिक स्थल था पर माहौल किसी पर्यटक स्थल जैसा था जगह –जगह लोग सेल्फी लेने में व्यस्त थे पर एक सीमा  रेखा  जरुर थी पर्यटक स्थल वाली उच्चश्रृंखलता नहीं थी |मंदिर में घूमते –घूमते दो घंटे बीत चुके थे इसलिए अब बारी पेट पूजा की थी |मंदिर परिसर में एक विशाल कैंटीन है जहाँ खाने पीने का सारा सामान बाजार भाव से महंगा उपलब्ध है आप यहाँ बाहर से खाने पीने का कोई सामान नहीं ला सकते हैं जो लेना है यहीं से खरीदीये |
साईं मन्दिर 
आज का दिन धर्म के नाम रहने वाला था इसके बाद मुझे बताया गया हम एक और मंदिर जायेंगे जो साईं बाबा का मंदिर है |मेरे मन में जिज्ञासा थी देश के इस हिस्से में भी साईं बाबा की पूजा कैसे होती होगी और यह जिज्ञासा मुझे इस मंदिर की ओर ले गयी ,यहाँ के साईं बाबा मंदिर की ख़ास बात यह थी कि यह मंदिर दो मंजिल का था नीचे के परिसर में शिर्डी के साई बाबा की मूर्ति थी तो ऊपर वाले परिसर में सत्य साईं बाबा की मूर्ति लगी थी और उसी मंदिर परिसर में भगवान शिव की भी पूजा हो रही थी |सिक्किम में मेरा एक और दिन समाप्त हो रहा था |
जारी..................................

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Monday, June 26, 2017

सिक्किम यात्रा :तीसरा भाग

महात्मा गांधी बाजार से होटल तक पहुँचने का रास्ता ड्राइवर तिलोक हमें अच्छी तरह समझा के
सिक्किम की टैक्सी 
गया था आपको सीढ़ियों से उतरना है और टैक्सी स्टैंड पर अम्दु बुलाई के लिए टैक्सी लेनी है वहीं हमारा होटल था जो इंदिरा बाई पास पर स्थित था कहना बड़ा आसान था पर मेरे जैसे आदमी के लिए थोडा मुश्किल था |इस कहानी को आगे बढ़ाने से पहले सिक्किम की टैक्सी के बारे में बता दूँ क्योंकि जहाँ तक मेरी जानकारी है ऐसी टैक्सियाँ पूरे भारत में कहीं न चलती होंगी |आपको जानकार हैरत होगी उत्तर भारत की मध्यम वर्ग की शान की शान की सवारी वैगन आर और आल्टो यहाँ ऑटो की तरह चलती हैं |गाड़ियाँ वही रहती हैं बस आगे का बोनट पीले रंग से रंग दिया जाता है कुछ के ऊपर टैक्सी लिखा रहता है नहीं तो ये पीला रंग ही किसी कार के टैक्सी होने की निशानी है |पहाडी भाग होने के कारण रिक्शा चल नहीं सकता और तीन पहिये वाले ऑटो को चलाना खतरनाक हो सकता है |
ट्रैफिक बूथ और व्यवस्थित ट्रैफिक 
आपको पूरे सिक्किम में उत्तर भारत की ये शान की सवारी टैक्सी के रूप में चलती दिखेंगी |एक जिज्ञासा मेरे मन में ही रह गयी जिसका जवाब मैं तलाश नहीं पाया |आम तौर पर पहाडी भागों में (कश्मीर, उत्तराखंड ) ये माना जाता है कि आल्टो और वैगन आर छोटी गाड़ियाँ होती और कमोबेश कमजोर भी इसलिए पहाड़ों में इनका बहुतायत से इस्तेमाल नहीं होता वहां बड़ी भारी गाड़ियाँ जैसे इनोवा ,सूमो ,क्वालिस जैसी गाड़ियाँ सफल रहती हैं क्योंकि ये ज्यादा मजबूत रहती हैं पर सिक्किम में इनका इस्तेमाल क्यों ज्यादा होता है पता नहीं चल पाया |गंगटोक शहर में भी दुपहिया वाहन मुझे न के बराबर दिखे और सुदूर इलाकों में भी यही गाड़ियाँ दिखी इसका मतलब आमतौर एक सामान्य सिक्किम निवासी गरीब नहीं है क्योंकि सुदूर पहाड़ों में बसे गाँवों के घरों में भी चार पहिया वाहन खड़े दिखे |वापस मुद्दे पर लौटते हैं मुझे बताया गया था अगर हम शेयर्ड टैक्सी लेंगे तो होटल तक किराया बीस रूपये प्रति व्यक्ति लगेगा और अगर पूरी टैक्सी लेंगे तो डेढ़ सौ रुपये हम टैक्सी स्टैंड पहुंचे ही थे कि हमारे साथ यात्रा कर रहे एक साथी यात्री अपनी पत्नी के साथ टैक्सी करने जा रहे थे उन्हें भी उसी होटल जाना था जब उन्होंने हमें देखा तो हमें भी अपने साथ आने के लिए कहा ये उनकी सदाशयता नहीं बल्कि पैसा बचाने का जुगाड़ था क्योंकि उन्होंने डेढ़ सौ में पूरी टैक्सी की थी पर टैक्सी वाले ने साफ़ –साफ़ कह दिया ड्राइवर समेत गाडी में पांच लोगों से ज्यादा नहीं बैठ सकते नियम सख्त है ढाई हजार रुपये का दंड लगेगा |नियम के प्रति ऐसी ईमानदारी अद्भुत थी वो बड़े आराम से हमें बैठा के पचास रुपये अतिरिक्त लेता तो भी हम फायदे में रहते पर उसने ऐसा नहीं किया |हमने एक सजी संवरी दूसरी टैक्सी ली जो लाल रंग की आल्टो थी जिसे एक खूबसूरत सांवला लड़का चला रहा था उसकी बोली से लगा उसका ताल्लुक बिहार से है पर मेरा अंदाजा गलत निकला उसकी जड़ें उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की थी पर वो पैदा यहीं हुआ था |पढ़ाई लिखाई में मन नहीं लगा तो माता –पिता ने गाडी खरीदवा दी उसकी वहां तीन गाड़ियाँ चलती थी उसने एक बोलेरो बलिया भी भेजी थी किराए पर चलवाने के लिए |मैंने पूछा कभी अपने माता –पिता के घर (बलिया ) जाते हो तो बोला साल में एक बार वहां जा के क्या करेगा वहां गोली पहले चलती बोली बाद में ,मैंने कहा फिर वही लोग जब बाहर के प्रदेश में जाते हैं तो ठीक कैसे हो जाते हैं उसका सीधा जवाब था यहाँ कानून टाईट है |मैं एक बार फिर सोच रहा था ऐसा क्यों ,किराया उतना ही पड़ा जितना हमें पहले बताया गया था न उससे कम न ज्यादा |
सडक पर बना पैदल पथ 

इस टैक्सी पुराण के बहाने मैं आपको गंगटोक की ट्रैफिक व्यवस्था के बारे में बताते चलूँ |पूरे शहर में सडक के किनारे –किनारे एक पैदल पथ है जिस पर पैदल चलने वाले लोग दिखेंगे |सडक संकरी हैं पर सड़कों पर सिर्फ गाड़ियाँ हैं लोग नहीं |टैक्सी सिर्फ टैक्सी स्टैंड पर रुकेगी चाहे आपका गंतव्य उससे कितना भी करीब क्यों न हो टैक्सी कहीं भी कभी भी नहीं रुकेगी |अगले दिन का एक वाकया है हम लोग घूम कर लौट रहे  थे और जोरदार बारिश हो रही थी सडक पर लोग नहीं थे पर हमारी टैक्सी होटल पर नहीं रुकी उसने  हमें भीगने से बचाने के लिए एक दूसरा रास्ता पकड़ा जो होटल के बेसमेंट में जाता था |वहां से होटल को फोन किया गया होटल वाले ने अपना वो बंद पड़ा बेसमेंट खोला जिससे चढ़ कर हम अपने कमरे तक पहुंचे |ये होती है नियमों के प्रति प्रतिबद्धता जिसका सम्मान भारत के जिस हिस्से में मैं रहता हूँ वहां नहीं दिखता |रात होते होते बादल उमड़ घुमड़ के बरसने लगे गंगटोक के होटल में एसी और पंखे नहीं होते इसलिए मैंने खिड़की खोल रखी थी मैं रात भर वर्ष्टि पड़े टापुर टुपुर सुनता रहा सुबह गंगटोक बादलों के आगोश में था और हमारा छान्गू झील जाने का कार्यक्रम बेकार हो चुका था क्योंकि बारिश से उस रास्ते पर भूस्खलन हुआ था और वह रास्ता पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया था इसी रास्ते पर आगे भारत चीन सीमा नाथू ला पास भी पड़ता है |सीमा देखने की मेरी कोई ख़ास इच्छा नहीं थी क्योंकि मैं राजौरी में भारत पाकिस्तान नियंत्रण रेखा देख चुका था पर छान्गू झील न देख पाने का दुख जरुर था |अब हमारे कार्यक्रम में तबदीली हो रही थी अब हमें नामची घूमने जाना जो गंगटोक से लगभग सत्तर किलोमीटर दूर था |मैंने अपने ड्राइवर तिलोक से पूछा वहां क्या उसने कहा कुछ पूजा का है मैंने सोचा कुछ बौद्ध धर्म से सम्बन्धित मामला होगा मेरे लिए ज्यादा मजेदार प्रकृति का साथ जो गाड़ियों में चलने के कारण हमें रास्ते में मिलता था |
सडक किनारे बिकते  भुट्टे 
मैंने पहाड़ों पर इतनी ज्यादा हरियाली कहीं नहीं देखी थी और इतने घने जंगल मन को मोह लेते थे कश्मीर और उत्तराखंड में भी हरियाली है पर इतनी  नहीं आपको कहीं भी पचास मीटर से ज्यादा खाली पहाड़ नहीं  दिखेंगे चारों ओर सिर्फ पेड़ ही पेड |यहाँ के पहाड़ों पर ख़ास बात है कि बांस के झुरमुट खूब मिलेंगे जो यहाँ के पहाड़ों को उत्तर भारत के पहाड़ों से अलग बनाते हैं दूसरी ख़ास बात उन पहाड़ों से गिरते हुए छोटे मोटे सैकड़ों झरने ,जहाँ कोई झरना बड़ा हो गया उसे एक टूरिस्ट स्पॉट मान लिया गया |यहाँ साल के पेड़ और बांस के झुरमुट आपका  सर उठा के स्वागत करेंगे तो नामची की यात्रा हमने भीगे मौसम में शुरू की |गंगटोक के बाहरी हिस्से में कई भुट्टे बेचने वाली महिलाएं दुकान सजा कर बैठी थी और उनकी दुकान मक्के के खेतों से मिली हुई थी मतलब इससे ताजा भुट्टे आपको भारत के किसी पहाडी हिस्से में नहीं मिलने वाले |मैं तिलोक से सिक्किम के बारे में पूछ रहा था उसने भारत का सिर्फ एक शहर देखा था वो भी कोलकाता जहाँ उसकी पहली बीवी का घर था |पहली बीवी ? हाँ उसने मुझे छोड़ दिया तो मैंने दूसरी शादी कर ली जब हम लौटेंगे तो मेरी बीवी भी इसी गाडी में लौटेगी क्योंकि नामची उसका मायका था और वो अपने घर गयी थी |
भीगा भीगा मौसम 
बच्चे ?मैंने पूछा |दो हैं उसने बताया लेकिन वो गंगटोक में घर पर हैं वो अकेले गयी है |तलाक कैसे होता है बोला हम लोग कोर्ट नहीं जाते सब समुदाय में ही हो जाता शांति से वैसे भी सिक्किम में लड़के कम और लड़कियां ज्यादा हैं और लड़कियां ज्यादा लड़के छोडती हैं |तिलोक कहीं बाहर नहीं जाना चाहता वो यह भी चाहता है टूरिस्ट यहाँ खूब आयें लेकिन यहाँ बसने के बारे में न सोचें |हम उस भीगते मौसम में आगे बढे चले जा रहे थे |खिड़कियाँ खोल दी गईं इतनी शुद्ध हवा न जाने फेफड़ो 
में कब जाए |

Sunday, June 25, 2017

सिक्किम यात्रा :दूसरा भाग

“बन जाखरी” जल प्रपात
गंगटोंक में एक रात बिताने के बाद अगली सुबह घूमने का कार्यक्रम शुरू हुआ पर मैं सिर्फ घूम नहीं रहा था मैं इस देश की विचित्रता को समझना चाहता था |भौगौलिक रूप से हमारी सुबह एकदम अलग हुई सामने पहाड़ों में बादलों ने डेरा डाला हुआ था और वो हमारे एकदम करीब थे |घूमने फिरने की जगह ज्यादातर एक जैसी होती हैं या तो इतिहास या प्राकृतिक या फिर मानव निर्मित कुछ अनूठी चीजें ,मैं समझना चाहता था जैसे उत्तर भारत के मैदानों में बैठकर हम अपने देश के जिन मुद्दों  के बारे में सोचते हैं क्या वाकई वो सारे देश के मुद्दे हैं या ये मुद्दे मीडिया निर्मित हैं जो एक निश्चित एजेंडे के साथ भावनाओं की चाशनी में लपेट कर हमारे सामने परोसे जाते हैं तो घूमने की शुरुआत करने से पहले बताते चलूँ सिक्किम अधिकारिक रूप से भारत का हिस्सा 1975 में बना उससे पहले इसकी स्थिति भूटान जैसी थी |विचित्र किन्तु सत्य अब जरा 1975 के पहले के सिक्किम के बारे में सोचिये और अंदाजा लगाइए कि वहां के लोगों के लिए दिल्ली और वहां के निवासी कैसे होंगे |वैसे अंग्रेजों को लाख गाली दी जाए पर कम से कम हमें वो एक पूरा देश बना कर दे गए नहीं तो देश के अलग –अलग हिस्सों में अलग –अलग राजवंश शासन कर रहे थे और तब के निवासियों में भारत देश के प्रति वैसी आक्रमकता नहीं  थी जैसी आज देखने पढने को मिलती सच तो यह है देश के आधे से ज्यादा लोगोंको सच में अपने देश के बारे में कुछ पता ही नहीं है |खैर नाश्ता करके होटल से बाहर निकला तो लगा थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ यूरोप के देश में हूँ |सड़क पर कूड़ा उठाने वाली मशीन महिला सफाई कर्मियों के साथ काम पर लगी है शहर में कूड़ा डालने के लिए जगह जगह पात्र रखे हुए हैं और पूरे गंगटोक शहर में तीन दिन के प्रवास में मुझे कहीं कूड़ा और प्लास्टिक देखने को नहीं मिला |प्लास्टिक सिक्किम में बैन है या नहीं इसका पता मुझे नहीं पड़ पाया क्योंकि प्लास्टिक के लिफाफे हमारे पास थे और किसी ने हमें टोंका नहीं पर इतने साफ़ पहाड़ आपको न तो कश्मीर में मिलेंगे न उत्तराखंड में (ये दोनों जगह मेरी देखी हुई हैं ) ऐसे न जाने सवाल मेरे जहाँ में घूम रहे थे सिक्किम और और उत्तर प्रदेश दोनों भारत में हैं फिर साफ़ –सफाई को लेकर ऐसा आग्रह पूरे भारत में क्यों नहीं दिखता यहाँ लोग खुले में क्यों नहीं फारिग होते |आप को जानकार ताज्जुब होगा मुझे बताया गया कि लघुशंका भी खुले में लोग नहीं करते खासकर पहाड़ों में क्योंकि वो पूजनीय है ,मुझे अपना प्रदेश याद आया तो ऐसे न जाने कितने सांस्कृतिक सवालों से दो चार होते हुए हम निकल पड़े अपने पहले पड़ाव “बन जाखरी” जल प्रपात देखने |बन जाखरी एक ऐसा झरना जहाँ कभी कोई तांत्रिक रहता था और अपनी तंत्र विद्याओं से लोगों का इलाज करता था हमने वहां ऐसी कई गुफाएं वहां देखीं और एक गुफा में बाकयदा एक शिवलिंग भी था जिस पर काई जमी हुई थी जो इस और इशारा कर रहा था यहाँ अमूमन पूजा नहीं होती  पर वहां हमने किसी पर्यटक को पूजा करते नहीं देखा  |
गुफा में  शिवलिंग 
एक हरे भरे पहाड़ में उंचाई से  गिरता झरना जो मनोहारी द्रश्य पैदा करता है चूँकि यह हमारा सिक्किम में पहला दिन था इसलिए उस प्रपात कोदेख कर अच्छा लगा पर एक पूरे हफ्ते सिक्किम के जिन हिस्सों से हम गुजरे ऐसे छोटे बड़े सैकड़ों प्रपात पहाड़ों से गिरते देखे |पर्यटकों में ज्यादातर बिहार और पश्चिम बंगाल के ही थे वैसे अब तक के अपने पर्यटन के अनुभव से कह सकता हूँ कि बंगाली सबसे ज्यादा पर्यटन प्रेमी होते हैं आप लेह से कन्याकुमारी और राजस्थान से पूर्वोत्तर तक कहीं भी जाइए आपको बंगाली जरुर मिलेंगे पर ये पर्यटन के वक्त अपने में सिमटे रहते हैं |बन जाखरी में कुछ घंटे बिताने के बाद अगला ठिकाना रूमटेक मोनेस्ट्री थी पर आगे चलने से पहले थोडा सा ज्ञान हम भारतीय अपने देश के बारे में कितना कम जानते हैं और एक ही देश में कितने तरह की स्थितियां एक साथ हैं |सिक्किम में मात्र चार जिले हैं  पूर्व सिक्किम, पश्चिम सिक्किम, उत्तरी सिक्किम एवं दक्षिणी सिक्किम हैं जिनकी राजधानियाँ क्रमश: गंगटोक, गेज़िंग, मंगन एवं  नामची हैं गंगटोक पूरे सिक्किम की भी राजधानी है यानि शहरों के अपने मुख्यालय हैं जिन्हें वहां की राजधानी कहा जाता है यह चार जिले पुन: विभिन्न उप-विभागों में बाँटे गये हैं। "पकयोंग" पूर्वी जिले का, "सोरेंग" पश्चिमी जिले का, "चुंगथांग" उत्तरी जिले का और "रावोंगला" दक्षिणी जिले का उपविभाग है।उत्तर भारत में ऐसी व्यवस्था नहीं शायद ऐसा वहां की भौगौलिक परिस्थिति के कारण हो |हमें गंगटोक ,ग्रेजिंग और नामची देखने का या कहें वहां से गुजरने का मौका मिला |रुम्टेक मोनेस्ट्री का रास्ता बहुत खराब था और धूप बहुत तेज पर गाड़ियों में एसी नहीं चलते अमूमन क्योंकि हवा रह रह कर ठंडी हवा इस धूप की तपन को कम कर देती है |गंगटोक से रुम्टेक की दूरी चौबीस किलोमीटर है |
रुम्टेक मोनेस्ट्री 
चूँकि मैंने लेह पूरा घूमा हुआ था इसलिए यहाँ मुझे ज्यादा आनंद नहीं आया लेह की मोनेस्ट्री के सामने यह कुछ भी नहीं है और इसका इतिहास भी ज्यादा पुराना नहीं है वैसे यह मठ लगभग तीन सौ साल पुराना है पर वर्तमान मठ का निर्माण 1960  में हुआ है  पर लेह के मुकाबले यहाँ  सुरक्षा का ज्यादा ताम –झाम है बगैर पहचान पत्र दिखाए आप यहाँ प्रवेश नहीं कर सकते यहाँ कबूतरों की एक बड़ी आबादी है जिन्हें आप दाने खरीदकर खिला सकते हैं |पूर्वोत्तर के राज्यों में जाने वाले पर्यटकों को मेरी सलाह अपना पहचान पत्र हमेशा अपने साथ रखें क्योंकि चीन से विवाद के कारण सेना से आपका आमना सामना होता रहेगा |
वैसे रुम्टेक मठ चर्चा में तब आया जब 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे तिब्बत से भागकर धर्मशाला होते हुए यहाँ आ गये कहानी में एक ट्विस्ट है एक और भारतीय करमापा भी थे जिन्हें दलाई लामा का समर्थन था और मठ की सम्पति को लेकर काफी विवाद हुआ मामला कोर्ट तक पहुंचा और अभी भी लंबित है |माना जाता है रुम्टेक मठ के पास 1.5 अरब डॉलर का खजाना है |दुनिया को मोह माया से ऊपर उठने की सीख देने वाले भी हमारे जैसे ही होते हैं अद्भुत किन्तु सत्य |17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे यहीं रहते हैं मैंने वहां घूम रहे लामा से पूछा क्या मैं 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे से मिल सकता हूँ क्योंकि मुझे बताया गया वो यहीं रहते हैं तो मुझे उत्तर मिला अभी वो कनाडा में हैं |
कबूतरों को दाना खिलाते पर्यटक 
एक और जिज्ञासा भी थी जिसका कोई भी लामा संतोष जनक उत्तर नहीं दे सका चूँकि मठ के अन्दर तस्वीर खींचने की इजाजत नहीं थी सो मैंने उस जिज्ञासा की तस्वीर नहीं ली हालाँकि लोग आसानी से मठ के अंदर की तस्वीरें ले रहे थे वैसे बगैर फ्लैश के तस्वीर लेने में कोई हर्ज नहीं होना पुरानी इमारतों में उकेरे भित्ति चित्र फ्लैश लाईट में खराब हो जाते हैं फिर भी भाईलोग धडधड फ्लैश चला रहे थे |मठ के अंदर घुसते सामने 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे का एक बड़ा सा चित्र है उसके नीचे दिया जल रहा है और नीचे बौद्ध परम्परा के अनुसार सिक्के और पैसे चढ़े हैं सिक्के बेतरतीब बिखरे हैं पर नोटों को एक कीप के आकार में मोड़कर खोंस कर लगाया गया ऐसा ही कुछ माहौल हमारे टैक्सी ड्राइवर ने अपनी गाडी में बना रखा था आप तस्वीर में देखकर उस माहौल का अंदाजा लग सकते हैं |
बौद्ध मठों में कुछ इस अंदाज में चढ़ावा चढ़ा रहता है 
जब हम मठ के अंदर की परिक्रमा करने गए तो हमने देखा 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे की तस्वीर के पीछे एक दीवार है और उसके पीछे गौतम बुद्ध की विशाल मूर्ति है जो उस दिवाल से छुप गयी है जिस पर 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे  की तस्वीर लगी हुई मतलब 17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे की तस्वीर वाली दीवाल जल्दी बनाई गयी है जिसके पीछे बुद्ध की प्रतिमा छुप गयी है |17वें करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजे  को आगे कर बुद्ध को क्यों छिपाया गया मैंने लामा से पूछा उसने कहा पूजा करने के लिए किसकी पूजा ? उसने जो कुछ मुझे बताया वो मेरे सामान्य ज्ञान से परे था |दिन के दो बज चुके थे अब बारी थी  इंस्‍टीट्यूट ऑफ तिब्‍बतोलॉजी देखने की  यहां बौद्ध धर्म से संबंधित अमूल्‍य प्राचीन अवशेष तथा धर्मग्रन्‍थ रखे हुए हैं। यहां अलग से तिब्‍बती भाषा, संस्‍कृति, दर्शन तथा साहित्‍य की शिक्षा दी जाती है।पर हाय रे नियति इतवार होने के कारण यह संस्थान बंद था वैसे हमारे ड्राइवर ने बताया यह पिछले इतवार को खुला था उसी परिसर से लगा हुआ |
द्रुल चोर्तेन स्तूप 
द्रुल चोर्तेन स्तूप था बौद्ध परम्परा में पूजा का स्थल अपर ऐतिहासिक रूप से काफी नया मेरे जैसे घुमक्कड़ जीव के लिए यहाँ कुछ नया नहीं था सिवाय इसके कि पूरे परिसर में अलसाई बिल्लियों की संख्या काफी ज्यादा थी जिन पर पर्यटकों की आवा जाही का कोई असर नहीं था वो बस मस्ती में सोई हुई थीं | अब बारी फूल प्रदर्शनी देखने की थी |यह एक ऐसी जगह थी जहाँ पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए फूलों की प्रदर्शनी चलती रहती है वैसे सिक्किम को लोग पर्यावरण के प्रति बहुत जागरूक हैं फिर भी चोग्याल पाल्देन ठोंदुप नामग्याल मेमोरियल पार्क में लगे इस फ्लावर शो ने मेरी  पेड़ पौधों के प्रति कम जानकारी को थोडा और बेहतर किया |रास्ते में एक छोटा सा भवन दिखा जो सिक्किम विधानसभा होने की गवाही दे रहा था न कोई सिक्योरिटी का ताम झाम न कोई रोड ब्लोक मतलब अगर हम अपनी गाड़ी रोक कर उतरते तो मुश्किल से बीस मीटर भी हमसे दूर नहीं था |मैं जब तक अपना कैमरा निकालता हम आगे बढ़ गए जनतंत्र को सही मायने में परिभाषित करती वो इमारत मेरी यादों में है क्योंकि उसके गला –बगल की इमारतों में ऐसी घुली मिली थी कि वो ख़ास इमारत है इसका आभास उसे देखकर नहीं होता जी हम भारत के ही एक राज्य में थे |
फ्लावर शो की यादें 
 चार बज गए थे अब हमारे पास दो विकल्प थे होटल जाकर आराम करें या गंगटोक की मशहूर महात्मा गांधी मार्केट से कुछ खरीददारी की जाए |हालंकि व्यक्तिगत रूप से बाजार घूमना और कुछ खरीददारी मेरे लिए दुनिया के सबसे बेकार कामों में से एक रहा है पर जनमत बाजार घूमने के पक्ष में था मैंने बेमन से हाँ कह दी ,हालाँकि सच बताऊँ अगर मैंने गंगटोक का वो बाजार न देखा होता तो निश्चित रूप से मैं सिक्किम के समाजीकरण के इस पक्ष के लिए हमेशा के लिए वंचित रह जाता पर अनजानी जगह डर बहुत लगता है क्योंकि हमारा ड्राइवर हमें मार्केट अकेला छोड़कर चला जाने वाला था और वहां से हमें अकेले अपने होटल जाना था जो वहां से पांच किलोमीटर दूर था |मैंने अपने डर को काबू करते हुए हर चीज नोट कर ली यहाँ तक आपात काल में किस को फोन करना है वगैरह वगैरह पर विश्वास जानिये इतना सौम्य अहसास मुझे आजतक भारत के किसी बाजार में नहीं हुआ |सिक्किम में बादल आते जाते रहते हैं कभी चमकदार तेज धूप तो थोड़ी देर बाद काले बादल (वैसे भी हम बारिश के मौसम में थे वैसे सिक्किम में साल भर थोड़ी बहुत बारिश होती रहती है इसीलिए यहाँ के पहाड़ पर काई बहुत जमी रहती है )| 
गंगटोक का बाजार 
 पहाड़ पर स्थित बाजार में हम सीढ़ी चढ़कर पहुंचे भदेस शैली में इस बाजार को देखते हुए मेरे मुंह से निकला “ओ तेरी” करीब दो सौ मीटर की सीधी लेन जहाँ किसी तरह का कोई वाहन नहीं बीच में डिवाइडर की जगह बैठने के लिए बेंच दोनों तरफ और छोटे छोटे पेड़ सफाई का आलम यह कि आप सडक पर लेट सकते हैं और मजाल है कि धूल का कोई कण आपके कपड़ों या शरीर पर लगे |गुटखा सिक्किम में प्रतिबंधित है पान की इक्का दुक्का दुकाने है जो आपको बहुत खोजने पर मिलेंगी जिसे कोई अपना कोई बिहारी भाई चला रहा होगा |बाजार में कोई शोर नहीं सब शांत खुबसूरत लड़कियां घूम रही हैं ,बैठी हैं झुण्ड में वो भी खालिस पाश्चात्य परिधान में पर न तो कोई फब्ती कस रहा है न घूर रहा है और सब कुछ अनुशासित अद्भुत अभी कुछ और झटके लगने थे |पार्किंग का कोई झंझट नहीं क्योंकि गाड़ियों के लिए एक जगह निश्चित है और उससे आगे कोई अपने बड़े होने का रुवाब झाड़ते कोई नहीं जाता यही अंतर है उत्तर भारत से जहाँ जो जितना कानून तोड़ता है वो उतना बड़ा माना जाता है पर यहाँ कानून डंडे के जोर से नहीं लागू है बल्कि कानून का पालन लोगों के व्यवहार में |खरीदने लायक मुझे ऐसा कोई सामान नहीं मिला वही सारे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के ब्रांड जिनसे हमारे माल्स भरे हुए वही यहाँ भी थे बस फर्क ये था कि ये सब छोटी छोटी दुकानों में थे |शराब की दुकान पर एक महिला अंग्रेजी शराब बेच रही है और लोगों की भीड़ है क्योंकि सिक्किम में  शराब उत्तर भारत के मुकाबले  बहुत सस्ती है और मजेदार बात यह कि लड़कियां भी बगैर डरे सहमे उस होती शाम को अपनी बारी आने की प्रतीक्षा में खडी हैं |एक बार फिर मैं बहुत कुछ सोच रहा था ऐसा क्यों है हमारा भारत सामजिक व्यवहार में इतना अलग –अलग क्यों है |इनको स्वच्छ भारत अभियान की जरुरत क्यों नहीं बेटी बचाओ बेटी पढाओ कि इनको क्यों नहीं जरुरत है इनका जीवन कितना मुश्किल है फिर भी सामाजिक व्यवहार में हमसे इतना आगे क्यों है यहाँ इतने स्कूल कॉलेज भी नहीं हैं जितने उत्तर प्रदेश  ,बिहार में  है फिर इतना अंतर क्यों |हमें हर चीज को समझाना पड़ता है यह तो सब कुछ समझे हुए है |अभी और शानदार अनुभव होने थे बहरहाल अब हमें होटल लौटना था और समस्या यह थी कैसे होटल तक पहुंचूं |
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............................................................जारी 

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