Tuesday, February 26, 2013

कब खत्म होगा ऑस्कर का सूखा


85वें ऑस्कर पुरुस्कारों की घोषणा हो चुकी है | हॉलीवुड में बनने वाली फिल्मों में भारत की पैठ बढ़ रही है और उसी अनुपात में ऑस्कर पुरस्कारों में भारतीय सम्बन्ध भी पर किसी भारतीय फिल्म के लिए ऑस्कर के मिलने का इंतज़ार अभी जारी है|एक ऐसे वक्त में जब जिंदगियां बहुत तेज़ी से बदल रही हों हमारी फ़िल्में भी बदल रही हैं पर कितनायह महतवपूर्ण है. ऑस्कर पुरूस्कार इसका एक पैमाना हो सकते हैं | बर्फी को इस वर्ष भारत की ओर से बेहतरीन विदेशी  फिल्म वर्ग के अंतर्गत ऑस्कर अवॉर्ड के लिए भेजा गया,पर यह पहले ही ऑस्कर की दौड़ से बाहर हो गईबर्फी के चुनाव के समय समीक्षकों ने इस बात पर सवाल खड़े किये कि इसके कुछ दृश्य  बैनी ऐंड जून और कोरियन फिल्म ओएसिस से मिलती-जुलती हैप्रियंका की जरा सी हंसी के लिए रणबीर का नाक का घुमाना सिंगिंग इन द रेन” से लिया गया हैवहीं चार्ली चैप्लिन की सिटी लाइट्स”(1931) के कुछ सीन भी फिल्म में दिखाई दिए|इतने व्यापक सांस्कृतिक उत्पादन के बावजूद हमारे सपनों और चिंताओं को बोलीवुड सिनेमा के रुपहले परदे पर उतनी विश्वसनीयता से उतार पाने में नाकाम रहा है कि उसे ऑस्कर पाने  के लायक समझा जाए|इस वर्ष भारत के ऑस्कर कनेक्शन पर खुशियाँ मनाई जा रही हैं माना जा रहा है कि ऑस्कर के  छत्तीस नामांकन से भारत का सम्बन्ध है,पर सिर्फ एक ही भारतीय वास्तविक पुरस्कार की दौड़ में शामिल था सबसे ज्यादा बारह नामांकन पाने वाली लिंकन” फिल्म के निर्माण में भारतीय कम्पनी रिलायंस की हिस्सेदारी है|ग्यारह नामांकन हासिल करने वाली लाइफ ऑफ पाई में भारत की कहानी और भारत में शूटिंग.जीरो डार्क थर्टी की भारत में शूटिंग और सिल्वर लाइनिंग्स प्लेबुक में अनुपम खेर का अभिनय|दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्मो का निर्माण करने वाला देशों में से एक भारत से अब तक चालीस से ज्यादा फ़िल्में ऑस्कर के लिए भेजी गयीं जिसमे अधिकतर हिन्दी फ़िल्में रही क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों को उतने ज्यादा मौके नहीं मिले आठ बार तमिल और दो बार बांगला भाषा को यह सम्मान मिला पर मराठी,मलयालम और तेलुगु जैसी भाषाओँ में बनी फ़िल्में सिर्फ एक बार ही विदेशी भाषा वर्ग के लिए नामंकित हो पाईं|भारत को ऑस्कर न मिल पाने के पीछे फिल्म फेडरेशन ऑफ़ इंडिया की जूरी पर भी उंगलियां उठती रही हैं| फिल्म फेडरेशन ऑफ़ इंडिया ही वह संस्था है जो भारत से कौन सी फिल्म ऑस्कर में नामंकित की  जायेगी इसका निर्णय लेती है लेकिन सत्यजीत रे की 'महानगरऔर 'शतरंज के खिलाड़ी', गुरु दत्त की 'साहिब बीवी और ग़ुलाम',जैसी फ़िल्में ऑस्कर पुरुस्कारों में भारत का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाईं| ऑस्कर के बोलीवुड कनेक्शन के पीछे भारतीय मध्यवर्ग जिम्मेदार है और इसीलिये अंग्रेजी फिल्मों को हिन्दी में डब करने की परम्परा बड़ी है ऐसे में किसी भी विदेशी फिल्म में भारतीय किरदार या भारतीय परिवेश फिल्म को व्यवसायिक रूप से सफल बनाने के लिए एक कारक हो सकता है|उदारीकरण के पश्चात मनोरंजन एक बड़े उद्योग के रूप में उभरा है हमारा बाजार बड़ा है पर तकनीक के लिए हमारी होलीवुड पर निर्भरता नयी नहीं है| भारतीय फिल्म बाजार में डब अंग्रेजी फिल्में औसतन पचास  करोड़ रुपैये का  वार्षिक का कारोबार कर लेती  हैं हालंकि  ऐसी फिल्में बाक्स ऑफिस की कुल फिल्मों की संख्या का दो से तीन प्रतिशत ही होती हैं लेकिन इनका असर मारक हो रहा है|हालंकि   हॉलीवुड की किसी फिल्म ने अभी  तक सौ करोड़ रुपैये के स्तर को नहीं छुआ है  लेकिन अवतार ने नब्बे  करोड़ 2012 फिल्म ने पैंसठ करोड़ और द एवेंजर ने सैंतालीस  करोड़ रुपैये का व्यवसाय कर ये बता दिया है कि हमारे दर्शक व्यवसाय के पैमाने पर कितने महत्वपूर्ण हैं भारतीय  हमारे सिनेमा में मौलिकता के नाम पर सिर्फ गाने हैं जिससे हमारी पहचान हैं दुनिया की अन्य भाषाओँ के लिहाज से भारतीय सिनेमा कंटेंट के लिहाज से कहीं नहीं ठहरता पर व्यवसाय के हिसाब से आप बौलीवुड को नजरंदाज नहीं कर सकते ईरानी भाषा में  फ़िल्में कम बनती हैं पर उन्होंने विश्व सिनेमा में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई है जिसमे मौलिकता और संप्रेषणीयता भी  |भारतीय फिल्मों में बढते कॉर्परेटीकरण से छोटे फिल्म निर्माताओं के लिए फिल्म बनाना मुश्किल है उनकी फिल्मों में वही निर्माता पैसा लगाएंगे जिसकी पटकथा में पैसा वापस लाने की गारंटी हो|भारतीय दर्शक एक विचित्र स्थिति का शिकार है कल्टीवेशन थ्योरी के अनुसार जो उसे दिखाया जा रहा है वह वैसी फ़िल्में  देखने का आदी हो चुका है वो ज्यादा की उम्मीद नहीं करता तभी तो तकनीक और प्रस्तुति में भले ही होलीवुड से पीछे हों , पर अपने दर्शकों का मनोरंजन करने में बहुत आगे हैं।वक्त है बदलाव का पर बड़े पैमाने पर हमारा सिनेमा कब व्यवसाय के अलावा कंटेंट के हिसाब से विश्वस्तरीय हो पायेगा इसका हम सबको इन्तजार है |
अमरउजाला में 26/02/13 को प्रकाशित 

Monday, February 25, 2013

रेडियो ही गाँव के लोगों का अपना माध्यम है


सूचना क्रांति का शहर केंद्रित विकास देश के सामाजिक आर्थिक ढांचे में डिजीटल डिवाईड को बढ़ावा दे रहा है ऐसे में रेडियो ही एक ऐसा जनमाध्यम है जो ग्रामीण भारत की सूचना जरुरत को पूरा करने में सक्षम है पर मुनाफे की इस दुनिया में भारत के उन लोगों की आवाज़ हाशिए पर ही है जो गाँवों से आते हैं .इसका एक अच्छा विकल्प सामुदायिक रेडियो हो सकता है. देश की जनसँख्या, और सांस्कृतिक विशिष्टताओं के हिसाब से यह संख्या नाकाफी है. भारत के दो छोटे  पडोसी देश नेपाल और श्रीलंका का रिकोर्ड सामुदायिक रेडियो के संदर्भ में  बहुत बेहतर है. संभावनाओं के लिहाज़ से सरकार ने इसके विकास पर ध्यान नहीं दिया है. इस समय भारत में एक सौ छबीस सामुदायिक रेडियो स्टेशन प्रसारण कर रहे हैं सरकार ने सामुदायिक रेडियो आंदोलन को बढ़ावा  देने के लिए 12वीं पञ्च वर्षीय  योजना में सौ करोड़ रुपये उपलब्ध कराएगी.इस  योजना अवधि के दौरान पांच सौ नये सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की स्थापना का प्रस्ताव है.  जिसमे वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए नब्बे  करोड़ रुपये का प्रस्तांव किया गया हैजबकि प्रशिक्षणक्षमता निर्माण और सामुदायिक रेडियो स्टेशनों की जागरूकता संबंधी गतिविधियों के लिए दस करोड़ रुपयों का प्रस्ताव किया गया है. इस क्षेत्र को अनुसंधान ओर नवीकरण के लिए अनुदान देने हेतु भी प्रावधान किये गये  हैं.देर से सही पर यह सही दिशा में उठाया गया कदम है. केन्द्र सरकार सामुदायिक रेडियो ऑपरेटरों से लिया जाने वाला वार्षिक स्पैक्ट्रम शुल्क भी  पूरी तरह से समाप्त करने पर विचार कर रही है भारत में सामुदायिक रेडियो का इतिहास बहुत पुराना नहीं है एक लंबे अरसे तक रेडियो तरंगों पर सरकारी अधिपत्य रहा है. सुप्रीम कोर्ट का फरवरी 1995 में दिया गया आदेश निर्णायक रहा जिसके अनुसार   ध्वनि तरंगे   सार्वजनिक सम्पति है और यहीं से भारत में  रेडियो के बहुआयामी विकास का रास्ता खुला यह तथ्य अलग है कि सरकार ने रेडियो के पूर्णता व्यावसायिक पक्ष पर ध्यान दिया और एफ एम् रेडियो स्टेशन शहर केंद्रित रहे . सामुदायिक रेडियो स्टेशन पचास वॉट की शक्ति वाले ट्रांसमीटर की सहायता से  पांच से पंद्रह किलोमीटर के कवरेज क्षेत्र तक पंहुचने वाले ऐसे छोटे रेडियो स्टेशन हैं जो ऍफ. एम. बैंड पर प्रसारण करते हैं एफ एम् बैंड पर प्रसारण करने के कारण इनकी आवाज़ गुणवत्ता पारम्परिक रेडियो प्रसारण से बहुत बेहतर होती है . इन सामुदायिक स्टेशनों को व्यवसायिक एफ.एम. रेडियो स्टेशन  की तरह उन्मुक्त विज्ञापन सुविधा का लाभ नहीं दिया जाता. इनकी स्थापना का मुख्य  उद्देश्य  सिर्फ  मनोरंजन न होकर शिक्षा,स्वास्थ्यपर्यावरण  पर जनजागृति लाना और लोकसंस्कृति के संरक्षण विकास   के लिए कार्य करना है. यह सीमित मात्रा में ही विज्ञापन ले सकते हैं.
भारत बदल रहा है पर गाँव तकनीक के तारों से उतनी तेजी से नहीं जुड़े जनमाध्यम का दावा करने वाले समस्त माध्यम शहर केंद्रित ही रहे सिर्फ रेडियो ही एक ऐसा माध्यम है जो गाँव के लोगों का अपना माध्यम रहा पर तकनीकी गुणवत्ता के लिहाज से ये प्रसारण उतने श्रवणीय नहीं रहे दूसरे देश में हुई मोबाईल क्रांति ने हर हाथ में रेडियो पहुंचा दिया पर मोबाईल रेडियो की समस्या यह है कि यह सिर्फ एफ एम् बैंड पर ही काम करते हैं ऐसे में आकाशवाणी का पारम्परिक प्रसारण इस तकनीक को गाँवों में आगे नहीं बढ़ा पाया.ऐसे बदलाव की प्रक्रिया में सामुदायिक रेडियो की तरक्की का रास्ता खुला जो अपने विशेषीकृत कार्यक्रमोंसे भौगोलिक और समान  रुचि के श्रोताओं की सेवा कर सकते हैं. वे ऎसी सामग्री का प्रसारण करते हैं जो कि किन्हीं स्थानीय/विशिष्ट श्रोताओं में लोकप्रिय हैजिनकी अनदेखी महज इसलिए कर दी जाती है कि वे व्यवसायिक रूप से मुनाफा नहीं दे सकते इनका सञ्चालन सामुदायिक स्तर पर होता है जो लाभ कमाने के लिए नहीं होता,यह व्यक्ति विशेषसमूह और समुदायों की अपनी परम्पराओं, अनुभवों को    श्रोताओं तक बांटने की प्रक्रिया को आसान बनाते हैं.भारत के गाँवों के लिए यह रेडियो सही मायने में जनमाध्यम की भूमिका निभा सकते हैं सरकार को इस दिशा में और ठोस प्रयास करने की जरुरत है कम से कम हर ब्लॉक में एक सामुदायिक रेडियो की स्थापना होनी चाहिए जिसके संचालन का जिम्मा पंचायतों के द्वारा किया जाना चाहिए.गाँवों में सूचना प्राप्ति का बड़ा माध्यम अभी भी रेडियो ही है तकनीक के लिहाज से गाँवों की क्या स्थिति है इसकी बानगी ये आंकड़े करते हैं इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिकभारत की ग्रामीण जनसंख्या का दो प्रतिशत ही इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहा है. इस वक्त ग्रामीण इलाकों के कुल इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में से 18 प्रतिशत को इसके इस्तेमाल के लिए 10 किलोमीटर से ज्यादा का सफर करना पड़ता है.
गाँव कनेक्शन 24/02/13 के साप्ताहिक अंक  में प्रकाशित लेख

Friday, February 22, 2013

इन्टरनेट के मैनर्स तो सीख लो जी

सुनिए ना........ कहना हम सब चाहते हैं पर क्या इसमें मामला मुश्किल तब पड़ जाता है कि क्या बोला जाए और कैसे . अब जरा ध्यान दिया जाए कि इस दुनिया में हर कोई बोले जा रहा है. फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साईट्स से लेकर टिवटर तक हर जगह उन्हीं का बोलबाला है जो बोल रहे हैं कह रहें हैं अच्छा है बात से बात निकलनी चाहिए पर सोसायटी में ऐसे भी लोग होते हैं जो क्या कहना और कैसे कहना है  इसका सलीका नहीं जानते हैं नो मोर ट्विस्ट अपुन सीधे फंडे पर आता है.सोसायटी में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें एंटी सोशल एलीमेंट कहा जाता है पर ये एंटी सोशल एलीमेंट अब सायबर स्पेस में भी घुसपैठ करने लग गए हैं.टेक्नोलोजी हमारे जीवन का अहम हिस्सा बनती जा रही है पर क्या उसके सही इस्तेमाल के लिए हम तैयार हैं ना जाने कितने मैनर्स हमें सिखाये जाते हैं पर अब वक्त है इंटरनेट मैनर्स सीखने का है .मेरे जीवन का अब तो नियम बन गया है सुबह कंप्यूटर खोलते ही फेसबुक पर अनचाहे टैग हटाना अनर्गल कमेन्ट को डिलीट करना और ना जाने क्या क्या महज इसलिए कि अभी बहुत से लोगों को इंटरनेट मैनर्स सीखना है .आइये आपको आस पास के माहौल से समझाते हैं .अभी शादी का मौसम चल रहा है आपको भी पता है पर जो आपको नहीं पता है वो मैं बताता हूँ कि आपने शादी में शौकिया नाचने वालों को देखा होगा इनकी भी अलग दुनिया होती है इनमे से कुछ बहुत कमेन्ट करने वालो की तरह होते हैं बोले तो बैंड बजा नहीं और ये चालूकुछ ऐसे लोग भी होते है जो पहचान के संकट के शिकार होते हैं यानि आइडेंटिटी क्रायसिस इन्हें ये पता नहीं कि नाचना कैसे है, बस नाचना है ऐसे लोग सोशल नेटवर्किंग साईट्स की दुनिया में भी होते हैं जो बस कुछ भी बोलते हैं कुछ भी लिखते हैं कुछ भी करते हैं.अरे भाई कहो खूब कहो पर पर्सनल और पब्लिक इस्यूएस को अलग अलग कर जब इन दोनों को मिला दोगे तो रायता फ़ैल जाएगा.आखिर हम सबके पास एक नन्हा सा दिल होता है जो धडकता है कभी किसी के प्यार पर तो कभी किसी के वार पर दिल तो दिल है ना अगर ये कहेगा नहीं तो बात आगे कैसे बढ़ेगी कुछ समझे नहीं ना.अगर आप चाहते हैं कि लोग आपके विचार को पसंद करें आपको सराहें पर उसके लिए पहल आपको करनी पड़ेगी कुछ कहना पड़ेगा यानि सुनना और कहना टू वे है.आप कुछ कह रहे हैं तो दूसरों को सुने भी और उसके बाद जब आप कुछ कहेंगे तो उसका असर होगा.अपने दर्द को दुनिया के साथ बांटिये शायद इनमे कोई शख्स मिल जाए जो आपकी परेशानी को कम कर सके.बहुत खुश हैं तो उसको बांटिये लोगों को बताइए कि आप खुश हैं फिर खुशियाँ बांटने से बढ़ती हैं.हम खुशनसीब हैं जो इस तरह की दुनिया में रहते हैं जहाँ हम ग्लोबल कनेक्टेड हैं समय और स्थान की दूरियां मिट गयी हैं .लोग तभी सुनेंगे जब आप कुछ कहेंगे और जब आप सुनेंगे तो लोग कहेंगे तो अपनी ऑनलाइन प्रोफाईल पर कुछ वक्त बिताइये लोगों को पढ़ने में बिना समझे कुछ भी मत कहिये.अनर्गल बातें टैग मत कीजिये किसी के व्यक्तिगत जीवन में क्या चल रहा है अगर इसको मुद्दा बनायेंगे तो कल को आपके बारे में कोई कुछ भी बोलेगा और तब आप कहेंगे कि दुनिया बड़ी खराब है.सायबर स्पेस को साफ़ सुथरा रखने की जिम्मेदारी हम सबकी है अगर यहाँ भी कोई एंटी सोशल एलीमेंट आ गया है तो उसे निकाल फेंकिये अपनी मित्रता सूची से रीयल वर्ल्ड को बेहतर बनाने का जरिया साइबर वर्ल्ड भी है अगर यहाँ गंदगी बढ़ेगी तो उसका असर हमारी रीयल लाईफ पर भी पड़ेगा तो घर की साफ़ सफाई के साथ सायबर वर्ल्ड की सफाई भी जरूरी है तो फेक प्रोफाईल रिक्वेस्ट को रिजेक्ट कीजिये और गंदगी फ़ैलाने वालों को ब्लौक तो अपने आस पास के लोगों को इंटरनेट मैनर्स सीखाइये फिर देखिये दुनिया कैसे बदलती है .
आई नेक्स्ट में 22/02/13 को प्रकाशित 

Monday, February 18, 2013

समय केसाथ बदलता खलनायकों का चेहरा

वैसे हम जानते हैं कि बुरे व्यक्ति एक आदर्श सभ्य समाज के निर्माण की प्राप्ति में बड़ी समस्या हैं और उनसे कुछ भी सीखा नहीं जा सकता और यही हाल हमारी फिल्मों का भी है .रीयल लाईफ की तरह रील लाईफ भी ऐसे नकारात्मक चरित्रों से भरी रहती है.जिन्हें हम खलनायक के नाम से जानते हैं और जिनके बगैर किसी फिल्म की कहानी अधूरी ही रहेगी.पत्रकारिक फिल्म लेखन में ज्यादा जोर नायक और नायिका के अलावा कहानी पर रहता है पर इस बदलती दुनिया में हमारे फिल्मों के खलनायक कैसे बदल गए इस पर कभी हमने गौर ही नहीं किया.यहाँ से पचास पचास कोस दूर जब कोई बच्चा रोता है वाला गब्बर कब गाँव के बीहड़ों से निकलकर कब शहर के उस आम इंसान जैसा हो गया कि उसको पहचानना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो गया.काफी समय तक खलनायक चरित्र,नायकों के बराबर का हुआ करता था जिसमे कन्हैयालाल, केएन सिंह, प्राण, प्रेम चोपड़ा, मदन पुरी, अमरीश पुरी, सदाशिव अमरापुरकर, कादर खान, शक्ति कपूर, अनुपम खेर, गुलशन ग्रोवर जैसे सितारे शामिल रहे.ये तथ्य अलग है कि इनके रूप,नाम और ठिकाने बदलते रहे कभी ये धूर्त महाजन,जमींदार,डाकू तो कभी स्मगलर और आतंकवादी के रूप में हमारे सामने आते रहे.व्यवस्था से पीड़ित हो खलनायक बन जाना कुछ ही फिल्मों का कथ्य रहा है पर एंग्री यंगमैन अमिताभ बच्चन के बाद खलनायक बस खलनायक ही हुआ करता था वह क्यों गलत है इस प्रश्न का उत्तर किसी भी फिल्म में नहीं मिलता.नब्बे के दशक के बाद में मानसिक रूप से बीमार या अपंग खलनायकों का दौर आया परिंदा में नाना पाटेकर,डर में शाहरुख खान ओंकारा में सैफ अली खान,‘दीवानगी’ के अजय देवगन और ‘कौन’ की उर्मिला ऐसे ही खलनायकों की श्रेणी में आती है.एक मजेदार तथ्य यह भी है कि दुष्ट सासों की भूमिका तो खूब लिखी गयी पर महिला खलनायकों को ध्यान में रखकर हिन्दी फिल्मों में चरित्र कम गढे गए अपवाद रूप में खलनायिका,गुप्त राज, और कलयुग जैसी गिनी चुनी फिल्मों के नाम ही मिलते हैं.बात को थोडा और बढ़ाते हैं समय के साथ इनके काम करने के तरीके और ठिकाने बदल रहे थे.जंगलों बीहड़ों से निकलकर पांच सितारा संस्कृति का हिस्सा बने खलनायक मानो अपने वक्त की कहानी सुना रहे हैं कि कैसे हमारे समाज में बदलाव आ रहे थे गाँव ,खेत खलिहान,जानवर फ़िल्मी परदे से गायब हो रहे थे और उनकी जगह कंक्रीट के जंगल सिनेमा के मायालोक का हिस्सा हो रहे थे.साम्प्रदायिकता कैसे हमारे जीवन में जहर घोल रही है इसका आंकलन भी हम फ़िल्में देखकर सहज ही लगा सकते हैं.सिनेमा के खलनायकों के कई ऐसे कालजयी खलनायक चरित्र जिनके बारे में सोचते ही हमें उनका नाम याद आ जाता है.कुछ नामों पर गौर करते हैं गब्बर,शाकाल,डोंन,मोगेम्बो,जगीरा जैसे कुछ ऐसे चरित्र हैं जो हमारे जेहन में आते हैं पर इन नामों से उनकी सामजिक,जातीय धार्मिक पहचान स्पष्ट नहीं होती वो बुरे हैं इसलिए बुरे हैं पर आज ऐसा बिलकुल भी नहीं है.संसधानों के असमान वितरण से परेशान पहले डाकू खलनायक आते हैं.मुझे जीने दो ,मदर इन्डिया,पान सिंह तोमर  जैसी फ़िल्में इसकी बानगी भर हैं  फिर समाजवाद व्यवस्था  ने हर चीज को सरकारी नियंत्रण में कर दिया जिसका नतीजा तस्करी के रूप में निकला और विलेन तस्कर हो गया.अमिताभ बच्चन का दौर कुछ ऐसी फिल्मों से भरा रहा,कालिया,दीवार, राम बलराम जैसी फिल्मे उस दौर की हकीकत को बयान कर रही थी.तस्करों ने पैसा कमाकर जब राजनीति को एक ढाल बनाना शुरू किया तो इसकी प्रतिध्वनि फिल्मों में भी दिखाई पडी अर्जुन ,आख़िरी रास्ता और इन्कलाब जैसी फ़िल्में समाज में हो रहे बदलाव को ही रेखांकित कर रही थी फिर शुरू हुआ उदारीकरण का दौर जिसने नायक और खलनायक के अंतर को पाट दिया एक इंसान एक वक्त में सही और गलत दोनों होने लगा,भौतिक प्रगति और वितीय लाभ में मूल्य और नैतिकता पीछे छूटती गयी और सारा जोर मुनाफे पर आ गया इसके लिए क्या किया जा रहा है इससे किसी को मतलब नहीं महत्वपूर्ण ये है कि मुनाफा कितना हुआ जिसने स्याह सफ़ेद की सीमा को मिटा दिया और फिल्म चरित्र में एक नया रंग उभरा जिसे ग्रे(स्लेटी)कहा जाने लग गया पर इन सबके बीच में खलनायकों की बोली भी बदल रही थी.सत्तर और अस्सी के दशक तक उनकी गाली की सीमा सुअर के बच्चों,कुत्ते के पिल्ले और हरामजादे तक ही सीमित रही पर अब गालियाँ खलनायकों की बपौती नहीं रह गयी.भाषा के स्तर पर भी नायक और खलनायक का भेद मिटा है.बैंडिट क्वीन से शुरू हुआ ये गालियों का सफर गैंग्स ऑफ वासेपुर तक जारी है जाहिर है गाली अब अछूत शब्द नहीं है वास्तविकता दिखाने के नाम पर इनको स्वीकार्यता मिल रही है और सिनेमा को बीप ध्वनि के रूप में नया शब्द मिला है.रील लाईफ के खलनायकों की ये कहानी समाज की रीयल्टी को समझने में कितनी मददगार हो सकती है ये भी एक नयी कहानी है .
 गाँव कनेक्शन में 18/02/13 को प्रकाशित     

Wednesday, February 13, 2013

मुकदमें निपटेंगे तभी कम होगी जेलों की घुटन


विधि द्वारा स्थापित व्यवस्था में जेल(कारागार) किसी भी अपराध का दंड है यानि जेल, तंत्र का वो अंग है जो इस दर्शन पर आधारित है कि अपराधियों को समाज से दूर रखकर एक ऐसा वातावरण दिया जाए जहाँ वह आत्म चिंतन कर सकें पर  क्या वास्तव में ऐसा हो रहा है. देश की अदालतों में 2 करोड़ 60 लाख से ज़्यादा मुक़दमे लंबित हैं. इनमें से कुछ मामले पचास साल से भी ज़्यादा पुराने हैं.भारत में जेल सुधारों की  त्वरित आवश्यकता है जिसका एक बड़ा कारण लंबित मुकदमों का बढ़ना ,न्यायाधीशों की कमी और सभी जेलों का क्षमता से ज्यादा भरा होना है.जिसका परिणाम कैदियों के खराब  मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के रूप में आ रहा है.जेल में यंत्रणा आम है.तिहाड जेल की सालाना समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार तिहाड में कैदी निर्धारित क्षमता से लगभग दुगुने हैं. पिछले वर्ष तिहाड़ में बंद 12,194 कैदियों में से 73.5 प्रतिशत अपने मुक़दमे की सुनवाई शुरू होनेका इंतज़ार कर रहे थे, 1987 में भारत के विधि आयोग द्वारा कराए गए एक अध्ययन के अनुसार प्रति दस लाख  नागरिकों में औसत रूप में  10.5 जज थे. 2008 मेंतत्कालीन कानून मंत्री एच.आर.भारद्वाज ने कहा था कि प्रतिदस लाख नागरिकों में न्यायाधीश का अनुपात चौदहथा.न्यायाधीशों की संख्या बढ़ानाउस समस्या के हल का एक पक्ष हो सकता हैजो भारत की खराब जेल व्यवस्था का एक बड़ा कारण है.जजों की संख्या कम होने से जेल में लंबित कैदियों की संख्या बढती जाती.जिस पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है ।भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, 2010 तक,देश के 240,000 कैदियों में 65.1 प्रतिशत अपने मुकदमों के शुरू होने का इंतज़ार कर रहे थे और 1,659 कैदी यानि कुल का 0.7प्रतिशत बगैरमुकदमा शुरु हुए पिछले पांच सालों से जेल में थे.आपराधिक मुकदमों  में ज्यादातर के पूरा होने में औसत रूप से तीन से दस साल का समय  लगता हैहालांकि दोषसिद्धि का समय मुकदमों के लिए जेल में बिताए समय  से घटा दिया जाता हैलेकिन इसकी वजह से कई निर्दोषों को बगैर किसी अपराध के जेल की सज़ा काटनी पड़ती है,पिछले दशक में विशेष अपराधों के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों का गठन कर इस मुद्दे को हल करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैंजिससे सुनवाई का इंतज़ार कर रहे लंबित मामलों में कमी आएगी परफास्ट-ट्रैक अदालतों का गठन समस्या का एकमात्र हल नहीं है इस व्यवस्था में जोर न्याय की बजायसमय पर होगा जो किसी भी दशा में  उचित नहीं माना जाएगा.दोषी पाए गए अधिकतर  कैदी बहुत गरीब हैं, 2010 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 125,789 दोषी पाए गए कैदियों में 37,994(74.9 प्रतिशत) या तो अनपढ़  थे या  दसवीं कक्षा से ज्यादा नहीं पढ़े थे.जेलों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं भी उपेक्षित मुद्दा है. जिनके अभाव में कई बार कैदी गंभीर रोगों का शिकार हो जाते हैं खासकर एचआईवी पोसिटिव कैदियों को  इलाज के लिए जिला अस्पतालों के भरोसे रहना पड़ता है.
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवेलपमेंट में समिति ने एक जेल मैनुअल तैयार किया जिसे केंद्र सरकार ने स्वीकार कर 2003 में राज्यों को भेज कर अपने कर्तव्य की इति श्री कर ली  पर जमीनी स्तर पर जेलों की दशा में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं हुआ.
हिन्दुस्तान में 13/02/13 प्रकाशित 

Monday, February 11, 2013

निजी एफ एम् स्टेशन सिर्फ लाभ कमाने वाले प्राधिकरण हैं



ब्रेख्त ने बीसवीं शताब्दी में रेडियो के लिए कहा था  कि रेडियो एकाउस्टिकल डिपार्टमेंटल स्टोर के रूप में केवल वितरण प्रणाली बनकर रह गया है .रेडियो एफ एम् स्टेशन के तृतीय चरण की नीलामी जून में शुरू होगी जिसमे 227 नए शहर जुडेंगे ,अभी वर्तमान में   86 शहर रेडियो की एफ एम् सेवा का लुत्फ़ उठा रहे है इसके बाद भारत में कुल एफ एम् चैनलों की संख्या 839 हो जाने की उम्मीद हैसरकार  को उम्मीद है कि इससे  1733 बिलियन रुपैये की आमदनी होगी|भारत में सर्वाधिक पहुँच वाला माध्यम रेडियो है इस नीलामी के बाद एफ एम् चैनलों की पहुँच में  कई नए शहर आयेंगे व्यवसाय की दृष्टि से भले ही यह फायदे का सौदा हो पर कंटेंट के स्तर पर भारत के एफ एम् चैनल   एक ठहरे मनोरंजक  माध्यम के रूप में तब्दील हो गए हैं जो  पिछले दस सालों में सिर्फ मनोरंजन के नाम पर हमें फ़िल्मी गाने और प्रेम समस्याओं को  ही सुना रहे हैं|तकनीकी तेजी ने मीडिया के अन्य रूपों में  बहुत बदलाव ला दिया है |टी वी खबरिया चैनलों की आने से समाचारों में प्रयोग की गति तेज हुई समाचार पत्रों में भी परिवर्तन की गति तेज हुई है नए नये स्तंभ शुरू किये गए ले आउट पर भी ध्यान दिया जाने लगापर एफ एम् रेडियो सिर्फ शहरी जनता का माध्यम मात्र बने हैं| एफ एम् स्टेशन  म्यूजिक रेडियो और  टाक रेडियो  के बीच संतुलन नहीं बना पाए हैं| यहां ध्यान देने की बात है कि मीडिया के विभिन्न रूपों यथा समाचारपत्रटेलीविजन,रेडियो और हालिया आए बेब में से रेडियो की पहुंच ही सबसे अधिक मानी गई है |भारतीय परिप्रेक्ष्य में तो रेडियो की पहुंच को देखते हुए ही इसे सबसे बेहतर जनसंचार माध्यम की संज्ञा दी गई है|मोबाईल सेवा के बढते प्रसार ने एफ एम् सेवाओं की पहुँच को एक नया आयाम दिया और हर हाथ में मोबाईल के साथ हर हाथ में रेडियो भी पहुँच गया है | कुछ वर्षों पहले टेलीविजन के तेजी से बढ़ते प्रभाव को देखकर ऐसा माना जाने लगा था कि रेडियो अपनी पहचान खो देगा लेकिन  रेडियो ने एक बार फिर वापसी की| इस बार रेडियो नए स्वरूप एफ एम के रूप में सामने आया  जो ध्वनि गुणवत्ता के मामले में पारम्परिक रेडियो प्रसारण से कई गुना बेहतर था   महानगरों से शुरु हुए रेडियो के इस संस्करण ने बड़ी ही तेजी से लोकप्रियता हासिल की पर यह भारत के बड़े शहरों तक ही केंद्रित रहा तीसरे चरण की नीलामी के बाद यह उम्मीद की जा रही है कि  रेडियो छोटे शहरों और गावों की तरफ बढ़ेगा| निजी एफ एम् रेडियो स्टेशन जहाँ सफलता की नयी कहानियां लिख रहे हैं वहीं सरकार उनकी लोकप्रियता का फायदा लोगों को जागरूक बनाने और स्वस्थ जनमत के निर्माण में नहीं कर पा रही है सभी निजी एफ एम् स्टेशन अपने प्रसारण का इस्तेमाल मात्र मनोरंजन के लिए ही कर रहे हैं इसका एक कारण जहाँ सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा निजी एफ एम् चैनलों पर समाचारों के प्रसारण पर लगाई गयी रोक  है जिससे समाचारों में आकाशवाणी का एकाधिकार बना हुआ है और उसे कहीं से प्रतिस्पर्धा नहीं मिल रही है और एफ एम् स्टेशन सिर्फ फ़िल्मी संगीत के एक डिब्बे के रूप में तब्दील हो गए हैं |पर बात महज समाचारों तक सीमित नहीं है संगीत के नाम पर सिर्फ फ़िल्मी संगीत को बढ़ावा देना भारत जैसे विविधीकृत देश की जनता के साथ अन्याय है जहाँ लोकसंगीत का खजाना बिखरा हुआ है वहीं कार्यक्रमों में नवचारिता का पूर्णता अभाव है|रेडियो नाटक जैसी विधा अब लुप्त होने के कगार पर है खाना पूर्ति के नाम पर आकाशवाणी में ही कुछ रेडियो नाटक बनते हैं|इस मामले में आकाशवाणी की विविध भारती सेवा फिर भी कुछ बेहतर कार्य कर रही है जिसके कार्यक्रमों में सूचना शिक्षा और मनोरंजन का तालमेल देखने को मिलता है भले ही उसके प्रसारण में फ़िल्मी गीतों की अधिकता है पर रेडियो की अन्य विधाओं के लिए भी वहां जगह है|निजी एफ एम् स्टेशन सिर्फ  एक लाभ अर्जित करने वाले प्राधिकरण के रूप में काम कर रहे हैं जबकि उम्मीद ये की गयी थी कि ये लाभ और मीडिया के सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन बनायेंगे पर व्यवहार में ऐसा होता नहीं दिख रहा है रेडियो समाचारों और विचारों  के क्षेत्र में एक जनमाध्यम के रूप में पिछड़ता जा रहा है महतवपूर्ण यह है कि एक जनमाध्यम के रूप में रेडियो की पहुँच और माध्यम की उपलब्धता भारत के परिप्रेक्ष्य में सबसे ज्यादा है जहाँ अखबार को पढ़ने के लिए पढ़ा लिखा होना जरूरी है वहीं टीवी अभी भी एक जनमाध्यम के रूप में एक महंगा और सर्वसुलभ माध्यम नहीं है सस्ती तकनीक और एक श्रवणीयमाध्यम होने के कारण इन सारी सीमाओं से परे है |पहले इसके लिए यह तर्क दिया जाता था कि रेडियो प्रसारण की गुणवत्ता ठीक नहीं है इसलिए श्रोता उससे दूर हो रहे हैं पर एफ एम् रेडियो स्टेशन और मोबईल पर इसकी उपलब्धता  ने इस मिथक को भी तोड़ दिया है अन्य जनमाध्यमों में समाचारों के प्रसारण /प्रकाशन के मुकाबले सरकारों का रेडियो के प्रति अति संवेदनशील होना बताता है कि इस माध्यम को सरकार कितनी गंभीरता से लेती है| एफ एम् रेडियो के तृतीय चरण की नीलामी सिर्फ एक उम्मीद ही जताती है पर भारत में एफ एम् रेडियो की उत्पादकता का दोहन होना अभी बाकी है और यह तभी हो पायेगा जब सरकार और निजी प्रसारकों दोनों अपनी जिम्मेदारी को समझेंगे जहाँ सरकार को एफएम पर समाचारों के प्रसारण की अनुमति देनी चाहिए वहीं निजी प्रसारकों को फ़िल्मी गीतों के बगैर इन्फोटेनमेंट की अवधारणा के बारे में सोचना होगा |रेडियो एक सस्ता साधन है बशर्ते सरकार इसके महत्व को समझे और ख़बरों व सूचनाओं पर सरकारी एकाधिकार की सोच से मुक्त हो ,मौजूदा रवैया किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए उचित नहीं .

गाँव कनेक्शन के 10 फरवरी 2012 के अंक में प्रकाशित 

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