Thursday, December 11, 2008

मैं लखनऊ हूँ

मत पूछिये अहले दिल क्या हाल है लखनऊ
हर शहर हर दयार से बढ़कर है लखनऊ

में ऐसा ही हूँ जी हाँ में लखनऊ हूँ मुझे बसाया भले ही भगवान राम के भाई लछमन ने लेकिन मुझे सजाने सवारने का काम किया नवाबों ने इस तरह मैं गंगा जमुनी तहजीब की जीती जागती मिसाल हूँ, लखनऊ हर वक्त में कुछ खास रहा है ज्यादा पीछे न जाते हुए मैं अपनी बात नवाबों से शुरू करूँगा नवाबी दौर में , मैं अपने अदब ,तहजीब , और तमीज के लिए जाना जाता था बाद में मेरी पहचान बने दशहरी आम ,चिकनकारी और मीठी खुशबू दार रेवडियाँ ,वक्त बदलता रहा और मैं भी ,मेरे सीने पर गुजरने वाले इक्के तांगों की आवाज़ मेरे कानों में मीठा रस घोलती थी लेकिन कब इसकी जगह सरपट फर्राटा भरते दोपहिये और चोपहिये वाहनों ने ले ली इसका मुझे पता भी न चला , बारह महीने चलने वाला पतंगबाजी का दौर कब साल के कुछ दिनों में सिमट गया , अपने घरों में खुशबूदार जायेकेदार खाना पकाने वाले लोगों ने जगह जगह खुले फ़ूड कार्नर के पकवानों का लुत्फ़ लेना शुरू कर दिया इसका भी एहसास मुझे न हुआ , हुक्के चिलम का दौर कब ख़तम हुआ और उनकी जगह मॉडल शॉप ने ले ली ये मंज़र भी मैंने देखा , मैंने ये भी देखा की पुराने लखनऊ की याद को ताज़ा करने और पुराने दौर को जीने के लिए लखनऊ के लोगों ने लखनऊ महोत्सव मनाना शुरू कर दिया .
समय वाकई बहुत तेज़ी से बदलजाता है मुझे इन सारे बदलावों से कोई शिकायत नहीं है क्योंकि अगर बदलाव न हो रहे होते तो मैं कब का मिट गया होता , परिवर्तन तो आगे बढ़ते रहने की निशानी है ये बदलाव होते रहेंगे तो मैं भी आगे बढ़ता रहूँगा . मैंने देखा अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि मैं अब पहले जैसा नहीं रहा ? क्या कोई इंसान हमेशा एक जैसा रहता है बच्चा कभी तो बड़ा होगा ही . मैं यही कहूँगा कि लोग भी अब पहले जैसे नहीं रहे .पुराने ज़माने में आबादी कम थी सिर्फ़ खेती से लोगों का काम चल जाता था और समय भी खूब रहा करता था और समय के सदुपयोग के लिए लोग पतंगबाजी किया करते थे शादियाँ तीन दिन में हुआ करती थीं पढ़ाई का महत्व लोग ज्यादा नहीं समझते थे . हर काम खरामा -खरामा (धीमे -धीमे ) हुआ करता था .
अब समय बदल चुका है मैं नहीं चाहता कि लोग २१वीन शताब्दी में भी मुझे सिर्फ़ नवाबों के कारण जाने , मैं नहीं चाहता कि लोग मुझे पिछडे शहर के नाम से जाने .बदलती दुनिया की रफ़्तार से कदम मिलाये रखने के लिए मुझे भी दौड़ना होगा .हम सिर्फ़ पुराने चित्रों के एल्बम देखते हुए और अतीत के गौरव को याद करके जिन्दगी न तो बिता सकते हैं और न ही उसे बेहतर बना सकते हैं नए एल्बम बनाने के लिए कुछ नया करना पड़ेगा , नहीं तो फर्क क्या रहेगा नए और पुराने लखनऊ में और तभी एल्बम भी नया बन पायेगा .
मेरे ऊपर जनसँख्या का दबाव बढ़ रहा है लेकिन उसी लिहाज़ से रोज़गार के अवसर भी बढे हैं .लखनऊ के लोग अब जिंदगी बिता नहीं रहे हैं बल्कि जी रहे हैं . लखनऊ महोत्सव जिन्दगी के महोत्सव हो जाने का उल्लास है .हर्ष है कि हम आज भी अपने अतीत और उससे जुडी हुई चीज़ों पर गर्व करते हैं लेकिन उन्हें ढोते नहीं हम आगे बढ़ना जानते हैं . हवाई जहाज़ के इस दौर मैं हम इक्के से कितनी दूर दौड़ पायेंगे इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है . आज लखनऊ शिक्षा और वज्ञानिक अनुसंधान केन्द्रों के मामले में भारत के नक्शे पर बहुत तेज़ी से उभरा है और इसका श्रेय यहाँ के बाशिंदों को जाता है जो पुरानी चीज़ों से चिपके नहीं रहे . ठहरा पानी गन्दा होता है बहता पानी साफ़ मैं बहता रहा हूँ और बहता भी रहूँगा. लखनऊ फ़ैल रहा है और विकसित भी हो रहा है
लखनऊ महज़ गुम्बद -ओ- मीनार नहीं
कूचा -ऐ -बाज़ार नहीं
इसके दामन में मुहबत के फूल खिलते हैं
इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं


दैनिक जागरण लखनऊ में ११ दिसम्बर को प्रकाशित

30 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया-लखनऊ का आत्म कथ्य!!

बधाई.

Priya said...

good afternoon sir........


first thing nice to meet you lucknow............ :)

Lucknow city famous for it's nawabs,kababs,tehzeeb,nazaaqut etc etc etc.... sir it's really nice u reminded us what lucknow is in true sense and which is not stagnant at all..coz if it will become stagnant then it will start decaying very well said sir, i am proud to be called as a lucknowite bcoz no place has such a sublime culture of love,affection and warmth feelings like of our's....

so at last "nth like our Lucknow"

prerna singh said...

bauth aacha hai .........lucknow esha hi hai......

Harsh mishra said...

क्या सिर्फ बदलाव ही आगे बढ़ने की निशानी है? और अगर हाँ तो एक दिन हम भी दौड़ते दौड़ते मुंबई या लन्दन बन जायेंगे? फिर लखनऊ ढूंढें नहीं मिलेगा? खैर इंसानी आदत ही अजीब है-पहले चीज़ों को बदलना और फिर बदली हुई चीज़ों को पहले जैसा बनाने के लिए बदलना. और इसी जद्दोजहद में एक दिन इतना बदल जाना ki आईने के सामने खड़े होकर एक अंजान अक्स से अपने बारे में पूछना-पर अच्छा है

apoorva srivastava said...

wow must say Excellent!! I have nevef felt the essence n fragnance of the city our city soo closely......In recent past I have stayed in new city for few months and during my dazz there I used to turn nostalgic ever now n then remembering my city n my ppl... But then too never felt the love so intense for my city..Really nice work n worth material to read...V must always cherish ur city n feel proud to be a part of such great legacy .....

shailendra said...

वाह, फरिश्तों का पता ढूढ़ते हुए...तुम्हारे ब्लॉग पर फिर पहुंचा हूं...अच्छा लिखा है मित्र...बहुत अच्छा...कीप इट अप....

nikhil's ankahi said...

Is lucknow se milkar maja aaya. Bhut khushi hui. Andajebayan wakai khunbsurat hai....Lucknow jis tarah apni kahani batata hai uski jitni tarif ki jaye kam hai.Aap cheezon ko kafi karib se mahsus kar lete hain.

मयंक said...

जनाब .... एक सामुदायिक ब्लाग का प्रयास शुरु कर रहा हूं....
कहते हैं की जब १८५७ के ग़दर के बाद जाने आलम वाजिद अली शाह को नज़र बंद करके कलकत्ता के पास मटिया बुर्ज़ भेजा गया था तो उन्होंने वहां भी लखनवी जलवे कायम करके एक दूसरा लखनऊ बसा दिया था। ये अदा सिर्फ़ लखनऊ के बाशिंदों की ही हो सकती है ,................लखनवी कहीं भी जायें लखनऊ उनके दिल से जुदा नही होता । हालत की गर्दिश और तकाजे ने लखनऊ वालों को लखनऊ से दूर जाने पर मजबूर किया है , लेकिन उनका दिल लखनऊ में ही कहीं बसता है...............उनकी नज़रें अपने लखनऊ को ही ढूंढती हैं ।
ब्लाग लखनउ पर आधारित है....अपनी ई मेल आई डी भेज दें .... आप को चिट्ठाकार मंडल में शामिल करना चाहूंगा
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kranti ki patrkarita said...

lucknow ko nazar lag gayi hain humari ya tumhari. Lucknow ko hum kuch bhi acha nahi de paye par lucknow ne humko kya diya kabhi is par gaur kiya. humane woh sab aacha kuch isse chura liya aur isko beech raho main akela chor diya. pata nahi kis baat ka dikhava karne ki aadat hain hume. hum tahzeeb bhule tameez bhule aur bhule sara jahan jaha hume kushi mile wahi hain hindustan. mud kar peeehey na dekhna ek alag baat hain. lekin jo apna tha kahi woh parya na ho jaye ye bhi dhaayan dena hoga.

ajay said...

मुकुल जी आपने जिस तरह हमारे लखनऊ को इस लेख में दर्शाया है, मैं आपके लेखन का कायल हो गया हूं। हमें गर्व है कि हम उस लखनऊ के बाशिंदे हैं, जिसकी तहजीब के बोल 'आदाब-आदाब' और जायकेदार मुगलई डिश 'कवाब' दोनों को यूनाइटेड नेशन्‍स द्वारा विश्‍व धरोहर में शामिल करने का प्रस्‍ताव रखा गया है।
वर्ल्‍ड हेरिटेज में शामिल होने जा रहा हमारा 'आदाब' पूरे विश्‍व में यह संदेश पहुंचा रहा है कि हम जितने भी आगे निकल जायें, अपनी नफासत को नहीं छोड़ेंगे।

AAGAZ.. said...

Nice to read about lucknow. nice one.. and now as a part of this city.. want to know more..

CHANDNI GULATI said...

Sir woh waqt bhi dur nahi hai jab hamare lucknow mein METRO train bhi farrate se daudege...aakhir hamara lucknow kisi metropolitan city se kam thode hai

virendra kumar veer said...

jis tarah humra lucknow vikas ki or bad raha hai o din duur nahi jab humare yanha lucknow me metro train daudegi. aab to humre yanha lucknow me Forigen Tourist ka aana lagatar bad raha hai usse lagta hai ki pure world me lucknow ki ek alag pechan ho jayegi.

i love lucknow.

archana chaturvedi said...

Lucknow mens luck + now yani kismt kahi or nai ab yahi hai badlav to chalta rahega par dood me hum itne aage na likal jaye ki piche lotne ka rasta hi bhul jaye par mujhe naaz hai ki kum se kum hum itaihas ko sanjoye hue hai

sana said...

hmare liye to lucknow naya shehar h par apke is lekh se kafi kuch janne ko mila sir aur wo b ek interesting way me

samra said...

Aye shehar-e-Lucknow tujhe mera salaam hai...
Tera hi naam dusra jannat ka naam hai...
sach Lucknow ki aan, baan, shaan ka kya kehna!!

Anonymous said...

lucknow mein reh kar bhi humko kabhi ehsaas nahi hua ki humare lucknow ki kya kahani hai , aur aaj lucknow ki kahani ussi ke zubani sun kar mehsoos hua ki bahot kuch badal gaya , aur bahot kuch badalna abhi baki hai ,

shaz yusuf said...

aye shehre lucknow tera andaz sabse juda hai .Shakeel Badayuni sahab ki nazm yaad aa gayi
"ye Lucknow ki sarzameen
ye Lucknow ki sarzameen
ye rang-roop kaa chaman
ye husn-o-ishq kaa watan
yahi to wo muqaam hai
jahaan Awadh ki shaam hai
jawaan-jawaan haseen-haseen
ye Lucknow ki sarzameen
ye Lucknow ki sarzameen"
bahot accha laga yeh kalam jo lucknow ki zabani tha

Arushi Tandon said...

a lovely picture of our city Lucknow....

Kumar's said...

sir, lucknow to wakai me badal raha hai, jin bato ke liye lucknow jana jata hai shayad kahin na kahin wo bate ab vilupt ho rahi hain? ye mera apna nazariya hai.....

ABID RAZA said...

Kharama kharama bahut khhob

Anonymous said...

There are some areas of information where you have to separate fact from fiction on the net.

Believe it or not, but the best information on this is not always found in the first few search results listings.

Avoid feeling like it is anything that only happens to you since it is not. As a result of our own experiences with [url=http://muahotdeal.com/thoi-trang.html]Thoi trang nam[/url] research, this series of reports was produced.

Then you will know more about it so you can make an intelligent decision and move forward with confidence.

The relative complexities of women's and men's fashion

Both women and men can feel the demands of maintaining their clothing up-to-date and in season, yet men's style frequently seems a lot easier. Of course, for both genders, outfits and style choices can be just as delicate, and there are several'trendy'items which can easily become fashion faux pas - who will say they often see people travelling in 70s flares? On the other side, men's style includes a few staple things that can exist eternally - which man is going to watch out of place with a good-quality, tailored suit, for example? Select classic pieces, colors and materials and you'll never look out-of-place.

Why common men's style is eternal

The classic man's suit has barely changed for over a hundred years. True, there are numerous kinds for different events, however they are all popular in their search for a wise, sharp search for the person. The good thing about classic fashion for men is that it's effortlessly stylish simply cool. A well-groomed gentleman can typically look his sharpest in a well-tailored suit, and it is a testament to the style of such clothing. A match will undoubtedly be utilized to work in many jobs due to the professional search it affords to the individual, instilling a sense of respect and confidence. Equally a match will be worn to several social functions, like a tuxedo to a black-tie event. This extraordinary versatility that enables suits to be worn in virtually all functions is what gives it its classic edge and a lasting devote men's fashion.

Modern movements in traditional men's fashion

Though classic men's styles can never be replaced, it's interesting to remember that shifts in men's fashion trends have brought particular classic clothes back into fashion. The reputation of vintage clothing, specially, has had back a wide-variety of basic designs into men's closets, such as that of the dandy gentleman. 'Dandy'is a term used to reference men who clothe themselves in a classic yet elegant way, acting in a polished method and placing value on appearance. This tendency for almost'over-the-top'traditional style for men is apparent from events like the'Tweed Run', where men and girls of all ages dress in notably Victorian-style attire and decide to try the streets on vintage cycles - with many of the men sporting flawless mustaches! That is only one of many samples of research showing the resurgence of such variations. There are also numerous blogs on line which give attention to gentlemanly style - such as'The Dandy Project'and'Dandyism'- as well as entire websites such as'The Art of Manliness'dedicated to giving articles on classic men's fashion and grooming.

In conclusion, although certain issues with basic men's style may be cut back as new trends, the essential outfits that they are derived from will never fall out of fashion.

"All it takes are a few basic garments. And there is one secret - the easier the better." - Cary Grant

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Our updates Recent articles:

Shainda Warsi said...

JI ME AATA HAI ZAMANE SE LGA LU TUMKO AYE LUCKNOW

LE LU AGOSH ME SINE SE LGA LU TUMKO AYE LUCKNOW

MT KHONA APNI YE NIRALI PEHCHAAN AYE LUCKNOW

TU HAI TAHZEEB-O-TAMADDUN KA GAHWARA AYE LUCKNOW.

neha bhandari said...

nawabo ka sehar Lko hai hi itna acha sir people like tahjeeb of lko n mehmaanavazi....:)

Suraj Verma said...

लखनऊ.. वो आई.टी. चौराहा.. वो हनुमान सेतु.. वो हजरतगन्ज की काफ़ी शाप... वो गोमती का पुल.. वो ज़िन्दगी से रफ़्तार मिलाती टाटा सूमो.. वो अमौसी के बाहर से अन्दर झाकते लोग.. वो अमीर अमीनाबाद की गरीब गलिया :) और नवाबियात,तहजीब,आदि। ऑय लव लखनऊ।

Mohona Dasgupta said...

“ऐ शहर–ए–लखनऊ तुझे मेरा सलाम है
तेरा ही नाम तो जैसे जन्नत का दूसरा नाम है ”
This article reminded me of the times when our family was preparing to pack our bags and move to Lucknow, I was too young at that point of time and leaving a city like Mumbai was not easy because I had spent almost 9 years of my life there. As a kid I saw the world n Mumbai and refused to believe that there is a world outside that premise. Since my mother was born and brought up in Uttar Pradesh she definitely loved the idea of being closer to the real ground, her ground. For about two months I suppose both me and my brother heard stories of Lucknow and Lucknowi tehzeeb. We were asked to behave very properly and greet everyone with a Namaste unlike Mumbai, where hello was the salutation even when we were not talking on a phone. Coming to Lucknow was a rather blissful experience the children seemed nicer but the teachers rather strict. It’s been almost 13 years since I’ve been in the city anad even if I’m a grown up now I refuse to believe that there’s a better world outside Lucknow. I thank the author to make me relive all these memories and also describe my changing Lucknow in the best possible manner.
Student rating – 4/5

Nishit Gupta said...

....Very progressive article. it does not carry the pressure of the past. There is no complaints of it's lost Glorious and leisure times.
You have very well articulated that change is the demand of today's time, and very convincingly stated the growing population's need & requirement . Now people do not have leisure time to enjoy the "patangbaazi" , or extended marriage celebrations. we have to keep pace with the neighbor towns/state and have to connect with the 'events ' and 'activities with people residing next to us in different geographical boundaries as our 'NEED 'will not be fulfilled in solitude. You very well support your 'commentary on Lucknow' with the adage "Nothing remains constant".To develop we need to grow, inculcate new values , shed fear of experimenting. It is a delight to read "kherama -- kherama" . Now this word is not in vogue.

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