Wednesday, October 18, 2017

डिजीटल भारत में कंप्यूटर शिक्षा

नब्बे के दशक में स्कूली शिक्षा में पुस्तक कला जैसे विषयों को हटाकर कंप्यूटर शिक्षा को स्कूली शिक्षा का अंग बनाया गया जिसका परिणाम यह हुआ कि दो हजार के शुरुआती दशक में ही भारतीय परचम इस क्षेत्र में लहराने लगा जिससे कई सारी मध्यम वर्गीय सफलता की कहानी बनी जैसे की इन्फ़ोसिस और अन्य स्वदेशी  कम्पनियां जिन्होंने लाखों युवाओं को इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया पर यह सफलता की कहानियां लम्बे समय तक जारी नहीं रह सकीं  |भारत में  सूचना प्रौद्योगिकी  का बाजार एक सौ पचास बिलियन डॉलर का है जो भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद का 9.5 प्रतिशत है और पूरी दुनिया में 3.7 मिलीयन लोगों को रोजगार प्रदान कर रहा  है |अर्थव्यवस्था को इतना महतवपूर्ण योगदान देने वाला क्षेत्र आज उत्पादकता के लिहाज से इसलिए पिछड़ रहा है क्योंकि भारत की कंप्यूटर शिक्षा में नवोन्मेष की भारी कमी है और यह बाजार की मांग के हिसाब से खासी पिछड़ी हुई है | तकनीक पर बढ़ती इस   निर्भरता को अनवरत और लाभ उठाने वाला तभी बनाया जा सकता है जबकि सूचना प्रौद्योगिकी  शिक्षा का अभ्यास कॉलेज और स्कूली स्तर पर ज्यादा अद्यतन तरीके से कराया जाए | स्कूल स्तर  पर कंप्यूटर शिक्षा पर दो तरह की समस्याओं का शिकार है| पहला स्कूलों में अभी भी फोकस एम् –एस वर्ड,एक्सेल,पावर प्वाईंट आदि पर है |दूसरा कंप्यूटर की प्राथमिक भाषाओँ को सिखाने में सारा जोर “बेसिक” और “लोगो” जैसी भाषाओं पर ही है |एक समय की अग्रणी कंप्यूटर भाषाएँ जैसे सी, लोगो ,पास्कल ,कोबोल बेसिक ,जावा जो की अब चलन से बाहर हो चुकी हैं अभी भी पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं जबकि कंप्यूटर प्रौद्योगिकी में अग्रणी देश ओपेन सोर्स सोफ्टवेयर और ओपन सोर्स लेंग्वेज को अपना चुके हैं जैसे कि  आर , पायथॉन  रूबी  ऑन  रेललिस्प टाइप स्क्रिप्ट कोटलिन स्विफ्ट और रस्ट इत्यादि |यह भाषाएँ  सी, लोगो ,पास्कल ,कोबोल बेसिक ,जावा के मुकाबले ज्यादा संक्षिप्त,सहज और समझने में आसान हैं |इन भाषाओँ के प्रयोग से किसी भी काम को कल्पना से व्यवहार में बड़ी आसानी से लाया जा सकता है |उल्लेखनीय है की यह भाषाएँ ही हैं जिनसे एक कोड का निर्माण कर किसी भी काम को करने के लिए सोफ्टवेयर का निर्माण किया जाता है |महत्वपूर्ण है कि ये भाषाएँ उन क्षेत्रों में भी ज्यादा काम की हैं जो आजकल बहुत मांग में है जैसे कि “आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस”, रोबोटिक्स आदि|
भविष्य की दुनिया तकनीक और ऑटोमेशन की है जहाँ सभी प्रकार के उद्योग धंधे और व्यवसाय सॉफ्टवेयर आधारित होंगे | आज हर उद्योग  किसी न किसी रूप में सूचना प्रौद्योगिकी की सहायता से चल रहा है  वो चाहे निर्माण,परिचालन ,भर्ती हो या लेखा सभी कम्प्युटरीकृत होते जा रहे हैं  और उपभोक्ता भी पहले के मुकाबले आज निर्णय और खरीदने की प्रक्रिया में ज्यादा से ज्यादा तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है |अब कंप्यूटर कौशल और उसकी भाषाएँ आधारभूत जरूरतें हैं | कंप्यूटर की उच्च शिक्षा का और भी बुरा हाल है |शिक्षण संस्थान प्रायोगिक कार्य और वास्तविक कोड निर्माण नहीं करवा पा रहे हैं इसलिए जब कोई कम्प्यूटर स्नातक किसी नौकरी में आता है तो वह अपनी कम्पनी में  इन कार्यों को  सीखता है जिससे कम्पनी पर अनावश्यक बोझ पड़ता है और बहुत समय नष्ट होता है |
 साल 2011 में आयी नासकॉम की एक रिपोर्ट के अनुसार देश के  मात्र 25 प्रतिशत आई टी इंजीनियर  स्नातक ही रोजगार के लायक थे पर छ साल बाद स्थिति और खराब हुई है | अस्पाएरिंग माईंड स्टडी की एक रिपोर्ट स्थिति की गंभीरता की ओर इशारा करती है ,रिपोर्ट के अनुसार भारत के पांच  प्रतिशत कंप्यूटर इंजीनियर ही  उच्च स्तर की प्रोग्रामिंग के लिए उपयुक्त  हैं |यह रिपोर्ट उस समय आयी है जब ग्राहकों की मांग लगातार बढ़ रही है |तेजी से डिजीटल होते भारत में जब रोजगार के नए क्षेत्र तेजी से ऑनलाईन दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं जिनमें कपडे प्रेस करने से लेकर टूटे नल को ठीक करने वाले प्लंबर जैसे काम भी  शामिल हैं  ये बताते हैं कि इस क्षेत्र में काम के अवसर और तेजी से बढ़ते रहेंगे |नई-नई  तकनीक और तकनीकी नवोन्मेष को भारतीय कौशल की विचार शक्ति में लाने के लिए ज्यादा मुक्त और उन्नत कंप्यूटर शिक्षा की तरफ बढना ही एकमात्र समाधान है अन्यथा एक वक्त में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अगुआ बनकर उभरे भारत के लिए प्रतिस्पर्धा के बाजार में टिकना सम्भव नहीं होगा |

अमर उजाला में 18/10/17 को प्रकाशित 

Tuesday, October 17, 2017

साहित्य का संसार

इस साल साहित्य का नोबेल पुरस्कार ब्रिटिश लेखक काजुओ इशिगुरो को देने का एलान किया गया है वैसे नोबेल किसी साहित्यकार के उत्कृष्ट होने का पैमाना नहीं है पर भारत में हिन्दी साहित्य कहाँ पिछड़ जाता है?ये सवाल उमड़ते घुमड़ते मुझे मेरे बचपन में ले गए,एक निम्नवर्गीय परिवार में पढने के संस्कार क्या होते हैं इसका पता मुझे कभी नहीं चला|यहाँ पढ़ाई का मतलब सिर्फ पाठ्यक्रम की किताबें थीं,या फिर कुछ पत्रिकाएं जो नियमित अंतराल पर लगातार तो नहीं ही मिलती थीं पर उसमें भी राशनिग थी|गृहशोभा ,मनोरमा जैसी पत्रिकाएं नहीं पढ़ सकता था|भले ही वो घर में इधर उधर छितरायीं पडी रहती हों |मैं उस दिन को याद करके आज भी दुःख से भर उठता हूँ कि मैं अपने जीवन की पहली कविता सम्हाल न सका,शायद तीसरी कक्षा में था गर्मियों की छुट्टी में स्कूल की बेकार डायरी में कार्बन लगा के अपनी माता जी के ऊपर एक कविता लिखी थी,वो कविता तो मुझे नहीं याद है पर वो थी बहुत अच्छी क्योंकि घर में सबसे सराहना मिली थी फिर बात आई गयी हो गयी|हमें यही सिखाया गया पढो तो कोर्स की किताबें,क्लास छ में मुझे उपन्यास पढने का चस्का लगा पर रानू और गुलशन नंदा के उपन्यास पढ़ते हुए जब मैं पकड़ा गया तो घर में काफी ज़लील होना पड़ा|अपने शैक्षिक जीवन की सीढीयाँ चढ़ते हुए,पाठ्यक्रम में प्रस्तावित साहित्य के अलावा हमारे जीवन में साहित्य कहीं था ही नहीं|साहित्यक किताबों पर खर्च पैसे की बर्बादी माना जाता था घर का ऐसा माहौल पता नहीं पैसे की कमी के कारण था या माता पिता के कम पढ़े लिखे होने के कारण,या बेटे को किसी तरह एक अदद सरकारी नौकरी के लायक बना देने के कारण पर आठवीं क्लास तक मेरे लिए  साहित्य का मतलब प्रेम चन्द,महादेवी वर्मा आदि ही था वो तो भला हो नवीं कक्षा में छात्रवृत्ति मिल गयी और मैं भारत के उन गिने चुने विदयालय में पहुँच गया जिसका पुस्तकालय आज भी मेरे सपने में आता है जिसने दुनिया भर के साहित्य से मेरा परिचय कराया पर पढने(साहित्य) का संस्कार न होने के कारण लम्बे समय तक इस समस्या जूझता रहा कि क्या पढूं और पाठ्यक्रम से इतर किताबे पढने से कहीं मैं अपना भविष्य तो नहीं चौपट कर रहा हूँ | यह शर्म लम्बे समय तक मुझे द्वन्द में फंसाए रखती थी जिससे उन दिनों मैं कभी पढने का लुत्फ़ नहीं उठा पाया पर पढने के संस्कार देर से ही सही मिलने लग गए और इस बात का अहसास भी कि अगर अच्छा लिखना है तो पहले पढना सीखना होगा अब ये तो नहीं पता कि मैं लिखना कितना सीख पाया हूँ पर पढ़ना जरुर सीख गया हूँ देर से ही सही पर मेरे जैसा भाग्य भारत के कितने लोगों को नसीब होता है जो कम से कम साहित्य पढने का सलीका ही सीख पायें |
प्रभात खबर में 17/10/17 को प्रकाशित 

Saturday, October 7, 2017

वीडियो बाजार का नया खिलाड़ी

जिस इंटरनेट की शुरुवात संचार में शाब्दिक संदेशों के आदान प्रदान से हुई थी वह ध्वनि से होते हुए वीडियो तक आ पहुंचा है | आज सारी दुनिया में जो माध्यम राज कर रहा है वह वीडियो ही है  और जिस माध्यम पर एक लम्बे समय तक यू ट्यूब का ही एकाधिकार था पर अब उसको चुनौती देने वाले कई खिलाड़ी मैदान में हैं |यूट्यूब की ओनलाईन वीडियो सीरिज  को चुनौती देने पहले आया नेट फ्लेक्स फिर अमेजन प्राईम पर अब इसी कड़ी में एक नया नाम जुड़ रहा है फेसबुक का जो फेसबुक वाच”  नाम से अपनी अलग वीडियो सीरिज लाने जा रहा हैटेकक्रंच वेबसाईट के मुताबिक इसमें कम्पनी दर्जनों वीडियो कार्यक्रम लायेगी जो रियल्टी टीवी से भी सम्बन्धित होंगेरियल्टी टीवी से तात्पर्य आम लोगों की असली कहानी |उम्मीद की जा रही है ऑनलाइन वीडियो सीरिज के बाजार में फेसबुक की मौजूदगी खेल के नियम बदल देगी इन होम वीडियो के कंटेंट के लिए फेसबुक ने दुनिया के कई दिग्गजों से करार किया है जिसमें रेसिपी वीडियो से लेकर मोटीवेशनल स्पीकर से लेकर यात्रा विषेज्ञय तक शामिल हैं|इसके अतिरक्त इसमें अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र से लेकर बेसबाल के खेल भी शामिल होंगे |फेसबुक इन वीडियो को बनाने वाले को विज्ञापन से प्राप्त कमाई का पचपन प्रतिशत हिस्सा देगा  और शेष पैंतालीस प्रतिशत फेसबुक खुद अपने पास रखेगा |शुरुवात में यह सेवा अमेरिका में शुरू होगी फिर सारी दुनिया में इसका विस्तार होगा |दुनिया भर में ऐसे धारावाहिकों के निर्माण में तेजी आई हैजो टीवी नहींइंटरनेट पर आते हैं। इसकी शुरुआत साल 1992 में अमेरिका के साउथ पार्क  के साथ हुई थीयह चलन अब भारत में भी जोर पकड़ रहा है। सही मायने में इंटरनेट धारावाहिकों के लिए भारत में यह सही वक्त भी है। पिछले कुछ साल में टीवी देखने का ढर्रा काफी बदला है। दुनिया में सबसे ज्यादा युवा आबादी वाले देश के दर्शकों की मांग को पूरा करने के लिए ज्यादातर पारिवारिक कहानियां हैंजिनमें युवाओं की कोई रुचि नहीं। वैसे भी आजकल कम से कम शहरों में पूरा परिवार एक साथ बैठकर टीवी नहीं देखता। स्मार्ट फोन  और कंप्यूटर ने हमारी इन आदतों को बदल दिया है। नई पीढ़ी की दुनिया अब मोबाइल और लैपटॉप में हैजो अपना ज्यादा वक्त इन्हीं साधनों पर बिताते हैं। जहां कोई कभी भी अपने समय के हिसाब से इन धारावाहिकों को देख सकता है। इंटरनेट के धारावाहिक कंटेंट के स्तर पर युवाओं की आशा और अपेक्षाओं की पूर्ति करते हुए नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं।   इण्डिया मोबाईल ब्रोड्बैंड इंडेक्स 2016 और के पी एम् जी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुल नेट डाटा उपभोग का अडतीस से बयालीस प्रतिशत हिस्सा वीडियो और ऑडियो पर खर्च किया जाता है |डिजीटल विज्ञापनों पर बढ़ता खर्च भी इसी तथ्य को इंगित कर रहा है साल 2015 में जहाँ इन पर 6010 करोड़ रुपये खर्च किये गये जिसके साल 2020 तक करीब चार गुना 25,520 करोड़ रुपये हो जाने की उम्मीद है |वैसे भी फेसबुक समाचारों का पर्याय बन चुका है बात चाहे प्रिंट माध्यम की हो या टेलीविजन की अब लोग इसी से अपनी सूचना की प्यास बुझा रहे हैं पर मनोरंजन के लिए लोगों की अभी ज्यादा निर्भरता वीडियो आधारित विशिष्ट चैनलों पर ही थी जिसे फेसबुक के माध्यम से शेयर किया जाता था और उससे आने वाला रेवन्यू फेसबुक को नहीं मिलता था जिसका ज्यादातर हिस्सा यू ट्यूब के पास ही है फेसबुक अन्य माध्यमों से वीडियो के मामले में आगे निकल सकता है क्योंकि उसके पास अपने उपभोक्ताओं का विशाल आंकड़ा भण्डार  है वो क्या करते हैं क्या पसंद करते हैं कहाँ रहते हैं उनकी रुचियों के हिसाब से फेसबुक वाच के वीडियो उनकी फीड में दिखने लगेंगे और उपभोक्ताओं के लिए अपने मनपसन्द वीडियो के लिए भटकना नहीं पड़ेगा और अगर उपभोक्ता उस वीडियो को लाईक करेगा तो उसे अगली किश्तों के कस्टमाईज नोटिफिकेशन अपने आप मिलने लग जायेंगे उसके अलावा लाईव चैट का विकल्प भी मौजूद रहेगा जो इन वीडियो कार्यक्रमों को ज्यादा इंटरेक्टिव बनाएगा फेसबुक की सीधी रणनीति है इंटरनेट पर वीडियो देखने की प्रवृत्ति को बदल कर टीवी जैसा बना देना जैसे अभी ज्यादातर लोग इंटरनेट पर मनोरंजन के लिए  वीडियो किसी प्लानिंग के तहत नहीं देखते बस स्क्रॉल करते कुछ अच्छा दिख गया तो देखने लग गए पर टीवी वे मनोरंजन के लिए समय पर देखते हैं बस यही प्रव्रत्ति फेसबुक वीडियो पर लाई जानी है जब लोग वीडियो देखते हुए सिर्फ वो कार्यक्रम न  देखे उनसे जुड़े लोगों से बात करें अपनी इच्छाएं बताएं उन पर वहीं चर्चा करें इतना इंस्टेंट  इंटरेक्टिवटी का स्तर फिलहाल फेसबुक ही दे सकता है जब फेसबुक लाईव पर चैनल अपनी खबर देते हैं या अन्य समाचार वेबसाईट लाईव करती हैं पर मनोरंजनात्मक वीडियो में यह सुविधा और किसी प्लेटफोर्म के पास उपलब्ध नहीं है |
फेसबुक के कड़े प्रतिद्वंदी यूट्यूबनेटफ्लिक्स और अमेजन प्राईम वीडियो फेसबुक की वीडियो सेवा का सामना कैसे करेंगे यह देखना दिलचस्प होगा क्योंकि यह सभी माध्यम अपने कार्यक्रमों के प्रमोशन और जानकारियों के लिए अभी फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग प्लेटफोर्म का ही इस्तेमाल करते हैं और इनके पास अपना कोई स्वतंत्र प्लेटफोर्म नहीं है ऐसे में विज्ञापनों से होने वाले  इनके मुनाफे पर निश्चित रूप से असर पड़ेगा |अमेरिका के बाद दुनिया में भारत ही फेसबुक का सबसे बड़ा बाजार है ऐसे में भारतीय उपभोक्ताओं के लिए निकट भविष्य में अच्छी खबर मिलने वाली है कि बीडियो कंटेंट के लिए अब जल्दी ही उनके पास ज्यादा विकल्प आने वाले हैं वहीं भारतीय  टीवी उद्योग को और तगड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा |
नवभारत टाईम्स में 07/10/17 को प्रकाशित 

Tuesday, September 12, 2017

रात की खूबसूरती

वैसे रात खूबसूरत होती है या दिन बता पाना  मुश्किल है पर अगर हमारे जीवन में रात न होती तो क्या होता ? रात महज रात नहीं बल्कि एक एहसास है. जीवन का एक  अहम हिस्सा जब हम दिन भर की थकान के बाद रात की गोद में आते हैं तो जो दुलार और अपनापन मिलता है वह दिन नहीं दे पाता. और इसी दुलार का एक हिस्सा उन लोरियों और कहानियां से जुड़ा होता हैं जो सिर्फ रात के लिए बचा कर रखी जाती हैं दिन कितना भी खूबसूरत क्यों न हो पर इन लोरियों और कहानियों का सुख उसके हिस्से कभी नहीं आता. वैसे कहानी से याद आया,कहानियां रात में ही सुनाई जाती हैं ,जरा अपना बचपना याद कीजिये जब रात का इंतजार सिर्फ इसलिए होता था कि रात में बाबा –दादी या मम्मी –पापा कहानियां सुनायेंगें|रात मतलब सपने वो भी कैसे –कैसे कभी वह लोग जो हमारे जीवन से हमेशा के लिए जा चुके हैं हम अपने जीवन में उनको कभी देख नहीं पाएंगे,वो इच्छाएं जो शायद इस छोटे से जीवन में हम कभी न पूरा कर पायें सब से मिलने का सब इच्छाओं को पूरा करने का जरिया सपने बन जाते हैं सपने तो जरिया भर होते हैं पर इन सबकी असली हकदार रात ही होती है.
रात बिताना और रात को जीना दोनों अलग विषय हैं.आपने जिंदगी में न जानें कितनी रातें बिताईं होंगीं पर क्या कभी रात को जी कर देखा.रात के गहराते न जानें कितनी यादें जी उठतीं हैं .भीगी रातों की यादें मन का कोई कोना गीला कर जाती हैं तो सर्द रातों में भी दिल कैसी कैसी यादों की गुनगुनी गर्माहट से गरमा जाता है.इन बातों का पता उन्हीं को चलता है जो रात को जी कर देख रहे होते हैं. रात हमें मौका देती है कुछ पल ठहरने का ,सुस्ताने का हमें अपने आप से बात करने का अपने आप के अन्दर झाँकने का, दिन की आपा धापी में हमने क्या सही किया क्या ग़लत किया.
जिस तरह सारे दिन एक जैसे नहीं होते हैं और उसी तरह से सारी रातें भी एक जैसी नहीं होती हैं किसी रात आप अपने किसी अज़ीज़ दोस्त की पार्टी में नाच गा रहे होतें तो किसी रात आप बिस्तर पर तनाव के कारण जगते हुए काट देते हैं और किसी रात आप ऐसा मस्त सपना देखते हैं कि आप सुबह होने ही नहीं देना चाहते हैं यही कहानी हर रात कहती है.हम उम्मीदों  भरे दिन का इन्तिज़ार हंसते गाते तभी कर पाएंगे जब रात को महसूस करना सीख लेंगे . सपने उम्मीदों,कहानियों और  यादों भरी रात.आने वाला दिन कैसा होगा इसकी नींव रात की उस काली स्याही से लिखी गई है जिसे दिन का उजाला भी खत्म नहीं कर पाता.
प्रभात खबर में 12/09/2017 को प्रकाशित 

Wednesday, August 23, 2017

प्रदूषण के मोर्चे पर दोहरी लड़ाई

प्रदूषण एक बड़ी समस्या है और कोई भी समस्या अपने साथ कई अन्य तरह की चुनौतियाँ भी लाती है ग्रीन पीस संस्था की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल वायु प्रदुषण से बाढ़ लाख लोग अकाल मृत्यु का शिकार हो जाते हैं पिछले दो दशकों से जबसे देश वैश्वीकरण की राह चला है देश की हवा लगातार रोगी होती जा रही है |पेट्रोल डीजल और अन्य कार्बन जनित उत्पाद जिसमें कोयला भी शामिल है |तीसरी दुनिया के देश जिसमें भारत भी शामिल है प्रदूषण के मोर्चे पर दोहरी लड़ाई लड़ रहे हैं | पेट्रोल डीजल और कोयला ऊर्जा के मुख्य  श्रोत हैं अगर देश के विकास को गति देनी है तो आधारभूत अवस्थापना में निवेश करना ही पड़ेगा और इसमें बड़े पैमाने पर निर्माण भी शामिल है निर्माण के लिए ऊर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए पेट्रोल डीजल और कोयला  आसान विकल्प  पड़ता है दूसरी और निर्माण कार्य के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटान और पक्के निर्माण भी किये जाते हैं जिससे पेट्रोल डीजल और कोयला  के जलने से निकला धुंवा वातावरण को प्रदूषित करता है | ऊर्जा के अन्य गैर परम्परा गत विकल्पों में सौर उर्जा और परमाणु ऊर्जा महंगी है और इनके इस्तेमाल में भारत  काफी पीछे है |
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत में काफी अंतर है। उदाहरण के लिए पचहतर  प्रतिशत ग्रामीण परिवार रसोई के ईंधन के लिए लकड़ी परदस  प्रतिशत गोबर की उपालियों पर और लगभग पांच  प्रतिशत रसोई गैस पर निर्भर हैं। जबकि इसके विपरीतशहरी क्षेत्रों में खाना पकाने के लिए बाईस प्रतिशत परिवार लकड़ी परअन्य बाईस प्रतिशत केरोसिन पर तथा लगभग चौवालीस  प्रतिशत परिवार रसोई गैस पर निर्भर हैं। घर में प्रकाश के लिए पचास प्रतिशत ग्रामीण परिवार केरोसिन पर तथा अन्य अडतालीस प्रतिशत बिजली पर निर्भर हैं। जबकि शहरी क्षेत्रों में इसी कार्य के लिए नवासी प्रतिशत परिवार बिजली पर तथा अन्य दस  प्रतिशत परिवार केरोसिन पर निर्भर हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में उपयोग होने वाले लगभग अस्सी  प्रतिशत ऊर्जा बायोमास से उत्पन्न होता है। इससे गाँव में पहले से बिगड़ रही वनस्पति की स्थिति पर और दबाव बढ़ता जा रहा है। भारत की हवा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए सर्कार सौर ऊर्जा को बढ़ावा दे रही है पर उनपर भी प्रदूषण का असर पड़ रहा है एनवायरमेंटल साईंस एंड टेक्नोलॉजी लेटर्स जर्नल की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के प्रदूषित वायुमंडल के कारण सौर  ऊर्जा का सत्रह प्रतिशत नुक्सान हो रहा है जिससे करीब 776 मेगावाट बिजली बनाई जा सकती थी |भारत के सन्दर्भ में प्रदुषण से सौर ऊर्जा को होने वाले नुक्सान की यह अपनी तरह की पहली रिपोर्ट है जो हमें चेता रही है कि अगर हमारा विकास का मॉडल समावेशी नहीं होगा तो ऊर्जा के गैर परम्परागत स्रोत भी सफल न हो पायेंगे |
अमर उजाला में 23/08/17  को प्रकाशित 

Tuesday, August 15, 2017

स्माईली का सवाल है !

अच्छा आपने बदलाव बहुत बात सुनी होंगी पर क्या इस बदलाव को महसूस किया है स्मार्ट फोन और इंटरनेट कितना तगड़ा बदलाव हमारे जीवन के हर पहलू में ला रहे हैं .कुछ का पता हमें पता पड़ता और कुछ का बिलकुल भी नहीं ,पीसीओ और साईबर कैफे इतिहास हैं हर हाथ में इंटरनेट बोले तो स्मार्टफोन जो भरे हुए हैं दुनिया भर के एप्स से . पहले भारत के एक सामान्य  इंसान का अगर तकनीक से बहुत पाला पड़ता था तो दो चीजें थी पहला कैलकुलेटर और दूसरा टाईपराईटर. तकनीक हमारी जिंदगी का कितना अहम हिस्सा होती जा रही है.ये तकनीकी बदलाव हमारे बात चीत करने की एक नयी वर्तनी गढ़ रहे हैं कितने नए शब्द मिल गए हैं हमें. थोडा सा डूड बनकर चलते हैं बाजार  घूमने  और देखते हैं इस नयी दुनिया में  लोग कैसे बोल बतिया रहे  हैं उप्प्स चैट कर रहे  हैं.यार् पिज्जा खाना है नॉट वरी चिलेक्स मुझे गूगल करने दे अभी बताता हूँ कि कौन सा पिज्जा आउटलेट करीब है.नेट स्लो है सेम ओल्ड कनेक्शन प्रोब्लम, क्या तू अभी एस एम् एस में अटका है,फैंक दे इस फ़ोन को कोई बजट स्मार्ट फोन ले ले.देख इंसान स्मार्ट हो न हो पर गैजेट स्मार्ट होने चाहिए. ये तो एक बानगी भर है वर्च्युल वर्ल्ड की बातें रीयल वर्ल्ड में कितनी तेजी से हमसे जुड़ती जा रही हैं. तू मेरा कैसा दोस्त है जो प्रोफेशनल लाइकर्स की तरह मेरी हर बात में हाँ हाँ किये जा रहा है तेरा भी कोई पॉइंट ऑफ व्यू है कि नहीं लाईफ का एक्टिव यूजर्स बन बिंदास कमेन्ट कर. यहाँ प्रेमी प्रेमिका भी कुछ ऐसी ही रौ में बहे चले जा रहे हैं उधर वो  चैट पर जल रही होती कभी हरी तो कभी पीली और इधर वो, तो बस लाल ही होता हूँ.तुम एक स्माइली भी नहीं भेज सकती,तुम बिजी हो तो मैं कौन सा हैबीटुएटेड चैटर हूँ और सुनो चैटर हो सकता हूँ चीटर नहीं.अब जवाब भी सुनिए वो भी कम दिलचस्प नहीं है काश तुम टाईम लाइन रिव्यू  होते जब चाहती  अनटैग कर देती  है. बाप बेटे की रोड पर होती तकरार का आप भी लुत्फ़ लीजिए.तुम इतनी रात तक चैट की बत्तियों को जलाकर किसको हरी झंडी दिखाते रहते हो.क्या पापा ऐसा कुछ भी नहीं है मैं तो बस फोन पर ही ऑनलाइन रहता हूँ.बेटे बाप हूँ तेरा मैं इन्विजीबल रहकर तेरी हर हरकत पर नजर रखता हूँ ये लड़कियों का चक्कर छोड़ पढ़ाई पर ध्यान लगा नहीं तो जिंदगी तुझे ब्लॉक कर देगी तब तू बस लोगों को फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजता फिरेगा और लोग तुझे वेटिंग में डालते रहेंगे. अगर आपको ये लेख पसंद आया हो तो मुस्कुराईयेगा जरुर आखिर एक स्माईली का ही तो सवाल है .
प्रभात खबर में 15/08/17 को प्रकाशित 

Saturday, August 12, 2017

वेब पर कैसे निखरें भारतीय भाषाएँ

इंटरनेट ने सही मायने में भारत को एक ग्लोबल विलेज के रूप में तब्दील कर दिया है|लम्बे समय तक भाषा एक बड़ी समस्या थी अगर आपको अंग्रेजी नहीं आती तो इंटरनेट पर आप सिर्फ तस्वीरें ही देख सकते थे पर स्पीच रिकग्नीशन टूल और यूनीकोड फॉण्ट ने वह समस्या भी दूर कर दी आपको बस अपने कंप्यूटर या स्मार्ट फोन  में कुछ सोफ्टवेयर या एप डाउनलोड करना है और आप इंटरनेट के विशाल सागर में गोते लगाने के लिए तैयार हैं वह भी अपनी भाषा में  |पर इंटरनेट में कुछ क्षेत्र अभी भी ऐसे हैं जहाँ बाजार न होने के कारण उसमें शोध और उन्नयन उस गति से नहीं हुआ जितना अंग्रेजी भाषा के साथ हुआ और यूनिकोड फॉण्ट उनमें से एक ऐसा ही क्षेत्र है |यूनिकोड फॉण्ट ऐसे फॉण्ट होते हैं कि उनमें लिखने पढने के लिए आपको अलग से उस फॉण्ट विशिष्ट को डाउनलोड करने की जरुरत नहीं होती और यह फॉण्ट इंटरनेट को सपोर्ट करते हैं |इंटरनेट में हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ  का विस्तार इसी फॉण्ट के ज़रिये लगातार गति पा रहा है पर यूनिकोड फॉण्ट की शैली में शब्दों के भावों को वयक्त करने के लिए जो विशिष्टता और विविधता हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओँ के फॉण्ट में होनी चाहिए हिन्दी के पारम्परिक फॉण्ट  (चांदनी ,कुर्ती देव ,खलनायक आदि ) के मुकाबले में वह नहीं है और इसी कारण हिन्दी की तमाम वेबसाईट प्रस्तुतीकरण में एक जैसी ही  दिखती है  और अगर इसकी तुलना अंग्रेज़ी के फॉण्ट से  की जाए तो हिन्दी के यूनीकोड फॉण्ट कहीं नहीं ठहरते पर तथ्य यह भी है कि हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं ने अंग्रेजी को भारत में इंटरनेट प्रयोगकर्ता भाषा के रूप में पहले ही दूसरे स्थान पर ढकेल दिया  है | गूगल और के पी एम् जी की रिपोर्ट के मुताबिक इंटरनेट पर भारतीय भाषाओँ के साल 2011 में 42 मिलीयन प्रयोगकर्ता थे जो साल 2016 में बढ़कर 234 मिलीयन हो गए हैं और यह सिलसिला लगातार बढ़ ही रहा है पर फॉण्ट की विविधता और वैशिष्ट्य  में अंग्रेजी अभी भी कहीं आगे है|ये फॉण्ट ही हैं जो वेबसाईट्स के कंटेट की द्र्श्यता में विविधता लाते हैं |जो पाठकों से विश्वास का सम्बन्ध बनाते हैं |पाठक उनके फॉण्ट से वेबसाईट का नाम तक पहचान लेते हैं |हिन्दी के ज्यादातर अखबार मुद्रित माध्यम में अपने लिए एक अलग प्रकार का फॉण्ट इस्तेमाल करते हैं पर मुद्रित माध्यम में वे पारम्परिक फॉण्ट का इस्तेमाल करते हैं और यूनिकोड फॉण्ट का छपाई में इस्तेमाल न के बराबर होता है |अंग्रेज़ी के फॉण्ट इस तरह की किसी भी सीमा से मुक्त हैं यानि जो फॉण्ट छपाई में इस्तेमाल होता है वही वेबसाईट या कंप्यूटर में भी इस्तेमाल किया जा सकता है |
लाखों करोडो वेबसाईट में फॉण्ट कंटेंट के प्रस्तुतीकरण के  नजरिये से अहम् भूमिका निभाते हैं |ऐसा ही कुछ अखबारों के साथ भी होता है पर वहां हिन्दी के पारम्परिक फॉण्ट इस्तेमाल किये जाते हैं जिनमें यूनीकोड के मुकाबले ज्यादा विविधता है पर इंटरनेट पर हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओँ की वेबसाईट फॉण्ट के नजरिये से एकरसता लिए हुए दिखती हैं |यूनीकोड फॉण्ट में विविधता की कमी के कारण मीडिया के अन्य माध्यमों जैसे समाचार पत्र ,फिल्म और टेलीविजन में यूनीकोड फॉण्ट का इस्तेमाल न होकर हिन्दी के पारम्परिक फॉण्ट का इस्तेमाल होता है जिनका प्रयोग करना यूनीकोड के मुकाबले कठिन होता है और इसके लिए जिस भाषा का वह फॉण्ट है आपको उस भाषा की पारम्परिक टाइपिंग आनी आवश्यक है | जबकि यूनीकोड इस तरह की समस्याओं से परे  है आप जो कुछ भी किसी भारतीय भाषा में कहना चाह रहे हैं आपको उसे बस रोमन में लिखना होता है और वह उस भाषा में अपने आप परिवर्तित हो जाता है पर अब भारतीय भाषाओँ के यूनिकोड फॉण्ट में भी बदलाव दिख रहा है और उसका बड़ा कारण हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ  का बढ़ता आधार है  |इंटरनेट पर 55.8 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी में हैजबकि दुनिया की पांच प्रतिशत से भी कम आबादी अंग्रेजी का इस्तेमाल अपनी प्रथम भाषा के रूप में करती है। इसके बरक्स अरबी या हिंदी जैसी भाषाओं मेंजो दुनिया में बड़े पैमाने पर बोली जाती हैंइंटरनेट सामग्री क्रमश: 0.8 और 0.1 प्रतिशत उपलब्ध है। बीते कुछ वर्षों में इंटरनेट और कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स जिस तरह लोगों की अभिव्यक्ति व अपेक्षाओं का माध्यम बनकर उभरी हैंवह उल्लेखनीय जरूर है|एक टाईप” ग्रुप  के पंद्रह लोगों की टीम ने भारतीय भाषाओँ के लिए छ: ऐसे यूनिकोड फॉण्ट विकसित किये हैं जो भारत की क्षेत्रीय भाषाओँ को एक ही तरीके से लिखे जा सकते हैं  इस ग्रुप के द्वारा विकसित मुक्ता देवनागरी फॉण्ट प्रधानमंत्री कार्यालय समेत लगभग पैतालीस हजार वेबसाईट के द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है |इसी का बालू फॉण्ट दस भारतीय भाषाओँ में उपलब्ध है जिनमें मलयालम,कन्नड़ और उड़िया जैसी भाषाएँ शामिल हैं |फॉण्ट संदेश प्रसार में कुछ ऐसा ही काम करते हैं जैसे आवाज का इस्तेमाल बोलने में होता है फॉण्ट शब्द के भावों को पाठकों तक ले जाते हैं और हर भाव के लिए एक ही फॉण्ट संदेश की गुणवत्ता को प्रभावित करता है |आज की पीढी इतना ज्यादा वक्त कम्प्यूटर पर बिता रही है तो पाठन एक अच्छे अनुभव में तब्दील होना चाहिए |
हिन्दी में शुरुवात में यूनिकोड फॉण्ट के लिए मंगल ही एक विकल्प हुआ करता था पर धीरे धीरे उसका यह एकाधिकार टूटा |एरियल यूनिकोड फॉण्ट के आने से हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ के फॉण्ट में एकरसता को विराम मिला है पर एरियल यूनीकोड  विंडोस टेन ऑपरेटिंग सिस्टम पर ही चलेगा और मंगल विंडोस सेवन पर   |गूगल के यूनिकोड में बत्तीस फॉण्ट हैं पर उसकी तकनीकी सीमायें हैं वो क्रोम पर ही काम करेंगे |मैक ऑपरेटिंग सिस्टम का देवनागरी फॉण्ट गूगल को सपोर्ट नहीं करेगा |बड़े संस्थान अपने लिए बाजार में विशेषीकृत यूनिकोड फॉण्ट पैसे देकर विकसित करा सकते हैं पर ऐसे में वो छोटे वेब प्रकाशक पिछड़ जाते हैं जो सीमित संसाधनों में अपनी वेबसाईट चला रहे हैं और उन्हें ओपन सोर्स के मुफ्त फॉण्ट पर निर्भर रहना पड़ता है जो अंग्रेजी के मुकाबले बहुत ही कम हैं |
जिसतरह भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ रहा था उस गति से हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ की वेबसाईट की डिजाइन और प्रस्तुतीकरण में वैविध्य का अभाव दिखता था उम्मीद की जानी चाहिए कि यूनीकोड फॉण्ट के ओपन सोर्स  में शुरू हुआ यह प्रयास जारी रहेगा और हिन्दी समेत अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में भी कंटेंट के साथ फॉण्ट में भी विविधता बढ़ती जायेगी |
नव भारत टाईम्स में 11/08/17 को प्रकाशित 

पसंद आया हो तो