Tuesday, August 15, 2017

स्माईली का सवाल है !

अच्छा आपने बदलाव बहुत बात सुनी होंगी पर क्या इस बदलाव को महसूस किया है स्मार्ट फोन और इंटरनेट कितना तगड़ा बदलाव हमारे जीवन के हर पहलू में ला रहे हैं .कुछ का पता हमें पता पड़ता और कुछ का बिलकुल भी नहीं ,पीसीओ और साईबर कैफे इतिहास हैं हर हाथ में इंटरनेट बोले तो स्मार्टफोन जो भरे हुए हैं दुनिया भर के एप्स से . पहले भारत के एक सामान्य  इंसान का अगर तकनीक से बहुत पाला पड़ता था तो दो चीजें थी पहला कैलकुलेटर और दूसरा टाईपराईटर. तकनीक हमारी जिंदगी का कितना अहम हिस्सा होती जा रही है.ये तकनीकी बदलाव हमारे बात चीत करने की एक नयी वर्तनी गढ़ रहे हैं कितने नए शब्द मिल गए हैं हमें. थोडा सा डूड बनकर चलते हैं बाजार  घूमने  और देखते हैं इस नयी दुनिया में  लोग कैसे बोल बतिया रहे  हैं उप्प्स चैट कर रहे  हैं.यार् पिज्जा खाना है नॉट वरी चिलेक्स मुझे गूगल करने दे अभी बताता हूँ कि कौन सा पिज्जा आउटलेट करीब है.नेट स्लो है सेम ओल्ड कनेक्शन प्रोब्लम, क्या तू अभी एस एम् एस में अटका है,फैंक दे इस फ़ोन को कोई बजट स्मार्ट फोन ले ले.देख इंसान स्मार्ट हो न हो पर गैजेट स्मार्ट होने चाहिए. ये तो एक बानगी भर है वर्च्युल वर्ल्ड की बातें रीयल वर्ल्ड में कितनी तेजी से हमसे जुड़ती जा रही हैं. तू मेरा कैसा दोस्त है जो प्रोफेशनल लाइकर्स की तरह मेरी हर बात में हाँ हाँ किये जा रहा है तेरा भी कोई पॉइंट ऑफ व्यू है कि नहीं लाईफ का एक्टिव यूजर्स बन बिंदास कमेन्ट कर. यहाँ प्रेमी प्रेमिका भी कुछ ऐसी ही रौ में बहे चले जा रहे हैं उधर वो  चैट पर जल रही होती कभी हरी तो कभी पीली और इधर वो, तो बस लाल ही होता हूँ.तुम एक स्माइली भी नहीं भेज सकती,तुम बिजी हो तो मैं कौन सा हैबीटुएटेड चैटर हूँ और सुनो चैटर हो सकता हूँ चीटर नहीं.अब जवाब भी सुनिए वो भी कम दिलचस्प नहीं है काश तुम टाईम लाइन रिव्यू  होते जब चाहती  अनटैग कर देती  है. बाप बेटे की रोड पर होती तकरार का आप भी लुत्फ़ लीजिए.तुम इतनी रात तक चैट की बत्तियों को जलाकर किसको हरी झंडी दिखाते रहते हो.क्या पापा ऐसा कुछ भी नहीं है मैं तो बस फोन पर ही ऑनलाइन रहता हूँ.बेटे बाप हूँ तेरा मैं इन्विजीबल रहकर तेरी हर हरकत पर नजर रखता हूँ ये लड़कियों का चक्कर छोड़ पढ़ाई पर ध्यान लगा नहीं तो जिंदगी तुझे ब्लॉक कर देगी तब तू बस लोगों को फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजता फिरेगा और लोग तुझे वेटिंग में डालते रहेंगे. अगर आपको ये लेख पसंद आया हो तो मुस्कुराईयेगा जरुर आखिर एक स्माईली का ही तो सवाल है .
प्रभात खबर में 15/08/17 को प्रकाशित 

Saturday, August 12, 2017

वेब पर कैसे निखरें भारतीय भाषाएँ

इंटरनेट ने सही मायने में भारत को एक ग्लोबल विलेज के रूप में तब्दील कर दिया है|लम्बे समय तक भाषा एक बड़ी समस्या थी अगर आपको अंग्रेजी नहीं आती तो इंटरनेट पर आप सिर्फ तस्वीरें ही देख सकते थे पर स्पीच रिकग्नीशन टूल और यूनीकोड फॉण्ट ने वह समस्या भी दूर कर दी आपको बस अपने कंप्यूटर या स्मार्ट फोन  में कुछ सोफ्टवेयर या एप डाउनलोड करना है और आप इंटरनेट के विशाल सागर में गोते लगाने के लिए तैयार हैं वह भी अपनी भाषा में  |पर इंटरनेट में कुछ क्षेत्र अभी भी ऐसे हैं जहाँ बाजार न होने के कारण उसमें शोध और उन्नयन उस गति से नहीं हुआ जितना अंग्रेजी भाषा के साथ हुआ और यूनिकोड फॉण्ट उनमें से एक ऐसा ही क्षेत्र है |यूनिकोड फॉण्ट ऐसे फॉण्ट होते हैं कि उनमें लिखने पढने के लिए आपको अलग से उस फॉण्ट विशिष्ट को डाउनलोड करने की जरुरत नहीं होती और यह फॉण्ट इंटरनेट को सपोर्ट करते हैं |इंटरनेट में हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ  का विस्तार इसी फॉण्ट के ज़रिये लगातार गति पा रहा है पर यूनिकोड फॉण्ट की शैली में शब्दों के भावों को वयक्त करने के लिए जो विशिष्टता और विविधता हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओँ के फॉण्ट में होनी चाहिए हिन्दी के पारम्परिक फॉण्ट  (चांदनी ,कुर्ती देव ,खलनायक आदि ) के मुकाबले में वह नहीं है और इसी कारण हिन्दी की तमाम वेबसाईट प्रस्तुतीकरण में एक जैसी ही  दिखती है  और अगर इसकी तुलना अंग्रेज़ी के फॉण्ट से  की जाए तो हिन्दी के यूनीकोड फॉण्ट कहीं नहीं ठहरते पर तथ्य यह भी है कि हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं ने अंग्रेजी को भारत में इंटरनेट प्रयोगकर्ता भाषा के रूप में पहले ही दूसरे स्थान पर ढकेल दिया  है | गूगल और के पी एम् जी की रिपोर्ट के मुताबिक इंटरनेट पर भारतीय भाषाओँ के साल 2011 में 42 मिलीयन प्रयोगकर्ता थे जो साल 2016 में बढ़कर 234 मिलीयन हो गए हैं और यह सिलसिला लगातार बढ़ ही रहा है पर फॉण्ट की विविधता और वैशिष्ट्य  में अंग्रेजी अभी भी कहीं आगे है|ये फॉण्ट ही हैं जो वेबसाईट्स के कंटेट की द्र्श्यता में विविधता लाते हैं |जो पाठकों से विश्वास का सम्बन्ध बनाते हैं |पाठक उनके फॉण्ट से वेबसाईट का नाम तक पहचान लेते हैं |हिन्दी के ज्यादातर अखबार मुद्रित माध्यम में अपने लिए एक अलग प्रकार का फॉण्ट इस्तेमाल करते हैं पर मुद्रित माध्यम में वे पारम्परिक फॉण्ट का इस्तेमाल करते हैं और यूनिकोड फॉण्ट का छपाई में इस्तेमाल न के बराबर होता है |अंग्रेज़ी के फॉण्ट इस तरह की किसी भी सीमा से मुक्त हैं यानि जो फॉण्ट छपाई में इस्तेमाल होता है वही वेबसाईट या कंप्यूटर में भी इस्तेमाल किया जा सकता है |
लाखों करोडो वेबसाईट में फॉण्ट कंटेंट के प्रस्तुतीकरण के  नजरिये से अहम् भूमिका निभाते हैं |ऐसा ही कुछ अखबारों के साथ भी होता है पर वहां हिन्दी के पारम्परिक फॉण्ट इस्तेमाल किये जाते हैं जिनमें यूनीकोड के मुकाबले ज्यादा विविधता है पर इंटरनेट पर हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओँ की वेबसाईट फॉण्ट के नजरिये से एकरसता लिए हुए दिखती हैं |यूनीकोड फॉण्ट में विविधता की कमी के कारण मीडिया के अन्य माध्यमों जैसे समाचार पत्र ,फिल्म और टेलीविजन में यूनीकोड फॉण्ट का इस्तेमाल न होकर हिन्दी के पारम्परिक फॉण्ट का इस्तेमाल होता है जिनका प्रयोग करना यूनीकोड के मुकाबले कठिन होता है और इसके लिए जिस भाषा का वह फॉण्ट है आपको उस भाषा की पारम्परिक टाइपिंग आनी आवश्यक है | जबकि यूनीकोड इस तरह की समस्याओं से परे  है आप जो कुछ भी किसी भारतीय भाषा में कहना चाह रहे हैं आपको उसे बस रोमन में लिखना होता है और वह उस भाषा में अपने आप परिवर्तित हो जाता है पर अब भारतीय भाषाओँ के यूनिकोड फॉण्ट में भी बदलाव दिख रहा है और उसका बड़ा कारण हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ  का बढ़ता आधार है  |इंटरनेट पर 55.8 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी में हैजबकि दुनिया की पांच प्रतिशत से भी कम आबादी अंग्रेजी का इस्तेमाल अपनी प्रथम भाषा के रूप में करती है। इसके बरक्स अरबी या हिंदी जैसी भाषाओं मेंजो दुनिया में बड़े पैमाने पर बोली जाती हैंइंटरनेट सामग्री क्रमश: 0.8 और 0.1 प्रतिशत उपलब्ध है। बीते कुछ वर्षों में इंटरनेट और कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स जिस तरह लोगों की अभिव्यक्ति व अपेक्षाओं का माध्यम बनकर उभरी हैंवह उल्लेखनीय जरूर है|एक टाईप” ग्रुप  के पंद्रह लोगों की टीम ने भारतीय भाषाओँ के लिए छ: ऐसे यूनिकोड फॉण्ट विकसित किये हैं जो भारत की क्षेत्रीय भाषाओँ को एक ही तरीके से लिखे जा सकते हैं  इस ग्रुप के द्वारा विकसित मुक्ता देवनागरी फॉण्ट प्रधानमंत्री कार्यालय समेत लगभग पैतालीस हजार वेबसाईट के द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है |इसी का बालू फॉण्ट दस भारतीय भाषाओँ में उपलब्ध है जिनमें मलयालम,कन्नड़ और उड़िया जैसी भाषाएँ शामिल हैं |फॉण्ट संदेश प्रसार में कुछ ऐसा ही काम करते हैं जैसे आवाज का इस्तेमाल बोलने में होता है फॉण्ट शब्द के भावों को पाठकों तक ले जाते हैं और हर भाव के लिए एक ही फॉण्ट संदेश की गुणवत्ता को प्रभावित करता है |आज की पीढी इतना ज्यादा वक्त कम्प्यूटर पर बिता रही है तो पाठन एक अच्छे अनुभव में तब्दील होना चाहिए |
हिन्दी में शुरुवात में यूनिकोड फॉण्ट के लिए मंगल ही एक विकल्प हुआ करता था पर धीरे धीरे उसका यह एकाधिकार टूटा |एरियल यूनिकोड फॉण्ट के आने से हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ के फॉण्ट में एकरसता को विराम मिला है पर एरियल यूनीकोड  विंडोस टेन ऑपरेटिंग सिस्टम पर ही चलेगा और मंगल विंडोस सेवन पर   |गूगल के यूनिकोड में बत्तीस फॉण्ट हैं पर उसकी तकनीकी सीमायें हैं वो क्रोम पर ही काम करेंगे |मैक ऑपरेटिंग सिस्टम का देवनागरी फॉण्ट गूगल को सपोर्ट नहीं करेगा |बड़े संस्थान अपने लिए बाजार में विशेषीकृत यूनिकोड फॉण्ट पैसे देकर विकसित करा सकते हैं पर ऐसे में वो छोटे वेब प्रकाशक पिछड़ जाते हैं जो सीमित संसाधनों में अपनी वेबसाईट चला रहे हैं और उन्हें ओपन सोर्स के मुफ्त फॉण्ट पर निर्भर रहना पड़ता है जो अंग्रेजी के मुकाबले बहुत ही कम हैं |
जिसतरह भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ रहा था उस गति से हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ की वेबसाईट की डिजाइन और प्रस्तुतीकरण में वैविध्य का अभाव दिखता था उम्मीद की जानी चाहिए कि यूनीकोड फॉण्ट के ओपन सोर्स  में शुरू हुआ यह प्रयास जारी रहेगा और हिन्दी समेत अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में भी कंटेंट के साथ फॉण्ट में भी विविधता बढ़ती जायेगी |
नव भारत टाईम्स में 11/08/17 को प्रकाशित 

Tuesday, July 11, 2017

उम्र के इस पड़ाव पर

बचपन,जवानी ,और बुढ़ापा जीवन के ये तीन हिस्से माने गए हैं ,बचपन में बेफिक्री जवानी में करियर और बुढ़ापा मतलब जिन्दगी की शाम पर जीवन में एक वक्त ऐसा आता है जब न बचपने जैसी बेफिक्री रहती है न जवानी में
करियर जैसा कुछ  बनाने की चिंता और न ही अभी जिन्दगी की शाम हुई होती है यानि बुढ़ापा |शायद यही है अधेड़ावस्था जब जिन्दगी में एक ठहराव होता है पर यही उम्र का वो मुकाम है जब मौत सबसे ज्यादा डराती है |
उम्र के इस  पड़ाव पर जो कभी हमारे बड़े थे धीरे धीरे सब जा रहे हैं और हम बड़े होते जा रहे हैं पर मुझे इतना बड़प्पन नहीं चाहिए कि हमारे ऊपर कोई हो ही न | मुझे अच्छी तरह याद है बचपन के दिन जब मैंने होश सम्हाला ही था कितने खुशनुमा थे बस थोड़ा बहुत इतना ही पता था कि कोई मर जाता है पर उसके बाद कैसा लगता है उसके अपनों को ,कितना खालीपन आता है जीवन में इस तरह के न तो कोई सवाल जेहन में आते थे और न ही कभी ये सोचा कि एक दिन हमको और हमसे  जुड़े लोगों को मर जाना है  हमेशा के लिएमम्मी पापा का साथ दादी –बाबा  का सानिध्य,लगता था जिन्दगी हमेशा ऐसी ही रहेगी|सब हमारे साथ रहेंगे और हम सोचते थे कि जल्दी से बड़े हो जाएँ सबके साथ कितना मजा आएगा पर बड़ा होने की कितनी बड़ी कीमत हम सबको चुकानी पड़ेगी इसका रत्ती भर अंदाज़ा नहीं था | मौत से पहली बार वास्ता पड़ा 1989 में बाबा जी का देहांत हुआ |
जल्दी ही हम सब अपनी जिन्दगी में रम गए| जिन्दगी अपनी गति से चलती रही तीन साल बाद फिर गर्मी की छुट्टियों में दादी की मौत देखी वह भी अपनी आँखों के सामने |मुझे अच्छी तरह से याद है वह गर्मियों की अलसाई दोपहर थी उस सुबह ही जब मैं सुबह की सैर के लिए निकल रहा था दादी अपने कमरे में आराम से सो रही थीं ,मुझे बिलकुल अंदाजा नहीं था कि अगली सुबह वह अपने बिस्तर पर नहीं बर्फ की सिल्लियों पर लेटी होंगीं , जीवन की क्षण भंगुरता का सच में पहली बार एहसास हुआ दादी जल्दी ही यादों का हिस्सा बन गयीं |हम भी आगे बढ़ चले |जिन्दगी खुल रही थी ,भविष्य ,करियर ,परिवार के कई पड़ाव पार करते हुए जिन्दगी को समझते हुए बीच के कुछ साल फिर ऐसे आये जब हम भूल गए कि मौत सबकी होनी है |  बाबा की मौत के बाद से किसी अपने के जाने से उपजा खालीपन लगातार बढ़ता रहा हम जवान से अधेड़ हो गए और माता –पिता जी बूढ़े जिन्दगी थिरने लग गयी | आस –पास से अचानक मौत की ख़बरें मिलनी  बढ़ गईं हैं पड़ोस के शर्मा जी हों या रिश्तेदारी में दूर के चाचा- मामा जिनके साथ हम खेले कूदे बड़े हुए  धीरे –धीरे सब जा रहे हैं सच कहूँ तो उम्र के इस पड़ाव पर अब मौत ज्यादा डराती है |
प्रभात खबर में 11/07/17 को प्रकाशित 

Saturday, July 1, 2017

एक क्लिक में मनपसन्द खाना

इंटरनेट पर्याप्त रूप से हमारी संस्कृति को प्रभावित कर रहा है और यह कार्य इतनी तेजी और शांति से हो रहा है कि हम समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या वाकई इंटरनेट इतना ताकतवर है आप इसे एप कल्चर भी कह सकते हैं जब संस्कृति का जिक्र हो तो उसमें इंसानी रहन सहनखान पान और परिधान अपने आप समावेशित हो जायेंगे |रहनसहन और परिधान के लिए पहले ही हजारों एप बाजार में आ चुके हैं और भारतीय उनका इस्तेमाल भी खूब कर रहे हैं पर इसी क्रम में खान पान भी शामिल हो चुका है|बाहर जाकर खाना खाने का दौर भले ही खत्म न हुआ हो पर मद्धिम जरुर पड़ रहा है अब लोग ऑनलाईन ऑर्डर करना ज्यादा पसंद कर रहे हैं और इसमें माध्यम बन रहे हैं खान पान से जुड़े एप जिनकी सहायता से आप अपना मनपसन्द खाना मंगा सकते हैं |वैश्विक शोध संस्था रेड सीर के आंकड़ों के अनुसार भारत में ऑनलाईन फ़ूड डिलीवरी बाजार  साल 2016 में डेढ़ सौ प्रतिशत की दर से बढ़ा  है वर्तमान में यह बाजार तीन सौ मिलीयन डॉलर का है |बाजार के इस बड़े हिस्से पर कब्ज़ा ज़माने की रणनीति के तहत गूगल और उबर जैसे बड़े वैश्विक इंटरनेट खिलाड़ी भी कूद पड़े हैं |गूगल ने ऑनलाईन खान पान के इसी बाजार पर  कब्जे  लिए एरियो एप लांच किया है जो  रेस्टोरेंट डिलीवरी और होम सर्विस प्लेटफोर्म सेवाएँ उपलब्ध करा रहा है  अभी  इस एप की सुविधा का लाभ हैदराबाद और मुंबई के निवासी ही उठा पा रहे हैं शीघ्र ही भारत के अन्य शहरों के निवासी इस सुविधा का लाभ उठा पायेंगे |उबर ने भी इसी साल  उबर ईट्स के नाम से एक एप सेवा भारत में भी शुरू की है  जिसकी सेवाएँ फिलहाल अभी मुम्बई में ही उपलब्ध हैं |
बदल रहा है सामाजिक ताना –बाना
एप आधारित ऑनलाईन की ये खान पान सेवाएँ भविष्य की और इशारा कर रही हैं कि किस तरह इंटरनेट हमारे जीवन के हर पहलू को हमेशा के लिए बदल डालने वाला है |संयुक्त परिवारों का पतन ,महिलाओं का कार्य क्षेत्र में बढ़ता दखल,शिक्षा के लिए घर से बाहर निकलते युवा  और शहरीकरण ऐसे कुछ कारक हैं जिन्होंने एक आदर्श भारतीय परिवार के ताने बाने पर असर डाला है |महिलाओं ने रसोईघर की देहरी को लांघ कर कम्पनी के बोर्ड रूम में अपनी जगह बनाई है जिससे यह धारणा टूटी है कि पुरुष कमाएगा और महिलायें खाना बनायेंगी |बढ़ता आय स्तर ,एकल और छोटे परिवारों ने जहाँ पति पत्नी दोनों काम करते हैं जैसे कुछ ऐसे कारक रहे हैं जिन्होंने ऑनलाईन खान पान के इस कारोबार को बढ़ावा देना शुरू किया है इसमें जहाँ एक तरफ अनेक  तरह के  खाने का लुत्फ़ मिलता है जिसमें फास्ट फ़ूड भी शामिल हैं वहीं अपने घर का आत्मीय वातावरण लोगों को ऑनलाईन खाना ऑर्डर करने के लिए प्रेरित करता है जिसके साथ आपको ऑनलाईन खरीददारी में कई तरह के डिस्काउंट भी मिलते हैं |ऑनलाईन खान पान एक पूर्णता शहरी प्रवृत्ति है और अभी भारत के टाईप टू और टाईप थ्री शहर इससे अछूते हैं इसलिए जैसे जैसे शहरीकरण बढेगा इस व्यवसाय को और पंख लगेंगे |दूसरा शहर बहुत तेजी से आकार में बढे हैं वहीं ट्रैफिक और पब्लिक ट्रांसपोर्ट की हालत बदतर हुई है ऐसे में बाहर जाकर खाने का विकल्प बड़े शहरों में  एक मध्यवर्ग परिवार या व्यक्ति के लिए एक महंगा और त्रासद पूर्ण अनुभव में तब्दील हो जाता है |तुलनात्मक रूप से ऑनलाइन खाने का ऑर्डर इन सब शहरी समस्याओं से बचाता है जिसमें ट्रैफिक में लगने वाला समय और पेट्रोल और टैक्सी पर किया गया व्यय शामिल है |
चुनौतियाँ भी है और कई
दुनिया में सबसे ज्यादा युवा आबादी वाले देश में चीन के बाद सबसे ज्यादा स्मार्ट फोन हैं और यही वो मैदान है जो दुनिया भर के लोगों को नवाचार करने के लिए आकर्षित कर रहा है |साल 2015 से  कई स्टार्ट अप इस क्षेत्र में शुरू हुए जिसमें ज़ोमेटोस्विगी ,फ़ूड पांडा जैसी कम्पनियां शामिल हैं जिन्होंने एप आधारित खान पान की सेवाएँ देनी शुरू कीं हालंकि व्यवसायिक रूप से यह कम्पनिया कोई ख़ास मुनाफा अभी तक कमा नहीं पायीं हैं और बाजार में जमे रहने के लिए संघर्षरत हैं| उबर की प्रतिद्वन्दी कम्पनी ने ओला  ने एक साल के भीतर ही अपनी ऐसी ही सेवा ओला कैफे भारत में बंद कर दी |पर गूगल और उबर जैसी कम्पनियों के मैदान में उतरने से मामला बहुत दिलचस्प हो गया है वो भी ऐसे वक्त में जब इस क्षेत्र में स्टार्ट अप की संख्या में गिरावट देखी जा रही है इन कम्पनियों का इस क्षेत्र में निवेश यह दिखाता है कि भारत एक नयी तरह के फ़ूड रिवोल्यूशन के लिए तैयार हो रहा है  |जाहिर है इसकी शुरुआत पिज्ज़ा और बर्गर जैसी फास्ट फ़ूड बेचने वाली कम्पनियों से हुई और इस प्रयोग की सफलता ने पूरे के पूरे रेस्टोरेंट को ऑनलाईन बनाने के लिए प्रेरित किया |यह कहना अभी जल्दीबाजी होगी कि ऑनलाईन खान पान के  इस  कारोबार का भविष्य उज्जवल है क्योंकि भारतीय रुचियाँ   भोजन के मामले में दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले अलग हैं इसका बड़ा कारण देश के खान पान में पर्याप्त विविधता होना जिसका एक बड़ा कारण जलवायु आधारित भोजन है जहाँ जिस चीज की प्रचुरता है वही वस्तु उस क्षेत्र के लोगों द्वारा सामान्य रूप से भोजन के इस्तेमाल में ज्यादा प्रयोग में लाई जाती है उत्तर भारत में जहाँ सरसों का तेल अधिक इस्तेमाल होता हैं वहीं दक्षिण भारत में नारियल का तेल |
शहरीकरण ने विस्थापन को पर्याप्त रूप से बढ़ावा दिया है और लोग देश के एक हिस्से से दूसरे  हिस्से में रोजगार के लिए जा रहे हैं और बस भी रहे हैं  पर खाने के मामले में उन्हें स्थानीय खानों पर ही निर्भर रहना पड़ता है क्योंकि वही सस्ते पड़ते हैं क्या ओनलाईन फ़ूड डिलीवरी बाजार  उनकी इस कमी को पूरा कर पायेगा इस प्रश्न का उत्तर समय के गर्भ में है  |
नवभारत टाईम्स में 01/07/17 को प्रकाशित 

Wednesday, June 28, 2017

स्मार्टफोन ने कम कर दिए साइबर चोरी के रास्ते

बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब लोग ब्रांडेड कंप्यूटर खरीदने  की बजाय उसे एसेम्बल करवाना ज्यादा पसंद करते थे और ज्यादातर कंप्यूटर सोफ्टवेयर पाइरेटेड होते थे |धीरे –धीरे तकनीक ने पैठ बनाई और लोग भी जागरूक हुए वहीं सोफ्टवेयर निर्माताओं ने भी जेनुइन सॉफ्टवेयर खरीदने वालों को प्रोत्साहित करने के लिए अपने सोफ्टवेयर की कीमतें कम कीं | एंटी पाइरेसी तकनीक बनाने वाली कम्पनी मूसो के एक शोध के मुताबिक सारी दुनिया में पाइरेसी साईट पर जाने वाले लोगों की संख्या में पिछले साल के मुकाबले छ प्रतिशत की गिरावट आयी है |इसका एक कारण नेटफ्लिक्स जैसी वीडियो कंटेंट उपलब्ध कराने वाली वेबसाईट का आना भी है जो दुनिया के चार देशों को छोड़कर हर जगह अपनी सेवाएँ दे रही हैं और दूसरा हॉट स्टार जैसे वीडियो एप की सफलता है |  
सारी दुनिया में पाइरेसी एक बड़ी समस्या है और इंटरनेट ने इस समस्या को और भी जटिल बना दिया है सोफ्टवेयर पाइरेसी से शुरू हुआ यह सफर फिल्म, संगीत धारावाहिकों तक पहुँच गया है |मोटे तौर पर पाइरेसी से तात्पर्य किसी भी सोफ्टवेयर ,संगीत,चित्र और फिल्म  आदि के पुनरुत्पाद से है जिमसें मौलिक रूप से इनको बनाने वाले को कोई आर्थिक लाभ नहीं होता और पाइरेसी से पैदा हुई आय इस गैर कानूनी काम में शामिल लोगों में बंट जाती है |इंटरनेट से पहले यह काम ज्यादा श्रम साध्य था और इसकी गति धीमी थी पर इंटरनेट ने उपरोक्त के वितरण में बहुत तेजी ला दी है जिससे मुनाफा बढ़ा है |भारत जैसे देश में जहाँ इंटरनेट बहुत तेजी से फ़ैल रहा है ऑनलाईन पाइरेसी का कारोबार भी अपना रूप बदल रहा है |पहले इंटरनेट स्पीड कम होने की वजह से ज्यादातर पाइरेसी टोरेंट से होती थी पर टोरेंट वेबसाईट पर विश्वव्यापी रोक लगने से अब भारत में पाइरेसी का चरित्र बदल रहा है क्योंकि अब हाई स्पीड इंटरनेट स्मार्टफोन के जरिये हर हाथ में पहुँच रहा है तो लोग पाइरेटेड कंटेंट को सेव करने की बजाय सीधे इंटरनेट स्ट्रीमिंग सुविधा से देख रहे हैं |ऑनलाइन पाइरेसी में मूलतः दो चीजें शामिल हैं पहला सॉफ्टवेयर दूसरा ऑडियो -वीडियो कंटेंट जिनमें फ़िल्में ,गीत संगीत शामिल हैं |सॉफ्टवेयर की लोगों को रोज –रोज जरुरत होती नहीं वैसे भी मोटे तौर पर काम के कंप्यूटर सोफ्टवेयर आज ऑनलाईन मुफ्त में उपलब्ध हैं या फिर काफी सस्ते हैं पर आज की भागती दौडती जिन्दगी में जब सारा मनोरंजन फोन की स्क्रीन में सिमट आया है और इन कामों के लिए कुछ वेबसाईट वो सारे कंटेंट उपभोक्ताओं को मुफ्त में उपलब्ध कराती हैं और अपनी वेबसाईट पर आने वाले ट्रैफिक से विज्ञापनों से कमाई करती हैं पर जो कंटेंट वे उपभोक्ताओं को उपलब्ध करा रही होती हैं वे उनके बनाये कंटेंट नहीं होते हैं और उस कंटेंट से वेबसाईट जो लाभ कमा रही होती हैं उसका हिस्सा भी मूल कंटेंट निर्माताओं तक नहीं जाता है |ऑडियो –वीडियो कंटेंट को मुफ्त में पाने के लिए लाईव स्ट्रीमिंग का सहारा लिया जा रहा है क्योंकि इंटरनेट की गति बढ़ी है और उपभोक्ता को बार –बार कंटेंट बफर नहीं करना पड़ता यानि अभी सेव करो और बाद में देखो वाला वक्त जा रहा है |यू ट्यूब जैसी वीडियो वेबसाईट जो कॉपी राईट जैसे मुद्दों के प्रति जरुरत से ज्यादा संवेदनशील है पाइरेटेड वीडियो को तुरंत अपनी साईट से हटा देती है पर इंटरनेट के इस विशाल समुद्र में ऐसी लाखों वेबसाईट हैं जो पाइरेटेड आडियो वीडियो कंटेंट उपभोक्ताओं को उपलब्ध करा रही हैं | मुसो की ही रिपोर्ट के मुताबिक पाइरेसी के लिए जिस तकनीक का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है उसमें स्ट्रीमिंग पहले नम्बर पर है जिसका कुल पाइरेसी में योगदान लगभग बत्तीस   दशमलव पांच प्रतिशत है दूसरे नम्बर पर पब्लिक टोरेंट उसके बाद वेब डाउनलोड ,प्राइवेट टोरेंट और स्ट्रीम रिपर्स शामिल हैं |भारत जैसे देश जो पाइरेसी की समस्या से लगातार जूझ रहे हैं वहां नेट की उपलब्धता का विस्तार पाइरेसी की समस्या को पूरी तरह से ख़त्म तो नहीं कर सकता पर कम जरुर करेगा क्योंकि भारत में डेस्कटॉप के मुकाबले स्मार्टफोन की संख्या लगातार बढ़ रही है |रिपोर्ट के मुताबिक़ विश्व में ऑनलाइन पाइरेसी शामिल चौसठ प्रतिशत लोग डेस्कटॉप कंप्यूटर के माध्यम से  पाइरेसी साईट पर जाते हैं वहीं मोबाईल फोन से इन साईट्स पर जाने वाले लोगों की संख्या मात्र पैंतीस प्रतिशत है |
हिन्दुस्तान में 28/06/17 को प्रकाशित लेख 

हम मानने को तैयार नहीं

जीवन के  दो युग आमने सामने हैं|मेरा चौदह वर्षीय बेटा अक्सर शीशे के सामने खड़ा होकर अपने आप को निहारा करता है अपनी उगती हुई हल्की दाढ़ी पर हाथ फेर कर पूछता है मैं कब शेव करूँगा ?और उसी वक्त मैं भी उसी शीशे के सामने अपने बचे हुए बालों को समेटते हुए उनको रंगने की जद्दोजहद में लगा रहता हूँ जिससे अपनी बढ़ती उम्र को छुपा सकूँ |बाल तो ठीक है पर पकी हुई दाढी को कितना भी क्यों न रंग लो एक दो बाल छूट ही जाते हैं जो आपकी बढ़ती हुई उम्र की चुगली कर ही देते हैं |मैं और मेरा बेटा उम्र के एक ऐसे ही दौर से गुजर रहे हैं जहाँ हम जो हैं वो मानने को तैयार नहीं है वो अब किशोरावास्था में है जब बच्चों के लिए बड़ा हो गया है और जवानों के लिए बच्चा ही है |उसका बाप यानि मैं अपनी जवानी की उम्र छोड़ आया है पर बुढ़ापा अभी आया नहीं है दोनों उम्र के जिस मुकाम पर हैं उसे बदलना चाहते हैं |मैं अपने सफ़ेद बालों को काले रंग से जिससे लोग मुझे अधेड़ न मानें और बेटा जल्दी से जल्दी दाढी उगा कर बड़ा हो जाना चाहता है | एक आगे निकल जाना चाहता है और एक पीछे लौटना चाहता है | दोनों ही दौर थोड़े मुश्किल होते हैं पर जहाँ किशोरवस्था में सपने  उम्मीदें और आने वाले एक बेहतर कल का भरोसा होता है वहीं चालीस पार का जीवन थोडा परेशान करता है |जिन्दगी का मतलब रिश्तों के साथ से होता है पर उम्र के इस पड़ाव पर इंसान का सबसे पहला करीबी रिश्ता  टूटता है यानि माता –पिता या तो वो जा चुके होते हैं या उम्र के ऐसे मुकाम  पर होते हैं जब कभी भी कोई बुरी खबर आ सकती है | जिन्दगी में एक अजीब तरह की स्थिरता आ चुकी होती है (अपवादों को छोड़कर) जहाँ से आप आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि आप कितनी दूर और जायेंगे |इस चालीस पार के जीवन में वो बातें अब अजीब लगती हैं जिनका हमने खुद अपने चौदह पार के जीवन (किशोरावस्था ) में बड़े मजे से लुत्फ़ उठाया था जैसे जोर जोर से गाने सुनना और बार –बार शीशे में चेहरा देखना |बेटे को जल्दी है ये समय जल्दी से बीत जाए और वो बड़ा हो जाए |मैं समय को रोक देना चाहता हूँ ताकि कुछ समय और मिल जाए |इन दिनों मुझे लखनऊ के शायर मीर अनीस साहब का एक शेर ज्यादा याद आता है “दुनिया भी अजब सराय फानी देखी,हर चीज यहाँ की आनी जानी देखी,जो आके ना जाये वो बुढ़ापा देखा,जो जाके ना आये वो जवानी देखी |
प्रभात खबर में 28/06/17को प्रकाशित 

Tuesday, June 27, 2017

सिक्किम यात्रा :अंतिम भाग

रिम्बी फाल 
पीलिंग की अगली सुबह कंचनजंघा पर्वतमाला में सूर्योदय के साथ शुरू हुई |सिर्फ चिड़ियों की चहचाहट और कोई मशीनी शोर नहीं ऐसी सुबह का आनन्द दशकों बाद उठाया था |गर्म पानी से नहाने के बाद एक बार फिर स्थानीय पर्यटन शुरू जो होना था |गाडी में कुछ दूर चलते ही पता लगा सडक पर जाम लगा पीछे गाड़ियों का काफिला बढ़ता ही गया पता चला आगे सडक पर बनाने का काम चल रहा है पर मजाल है किसी गाडी में हॉर्न की आवाज सुनाई पडी हो लगभग आधे घंटे के बाद सडक थोड़ी देर के लिए खोली गयी और हमारी गाडी उस जाम में से निकल गयी |अगला पड़ाव था रिम्बी फाल या रिम्बी जलप्रपात वैसे सच बताऊँ तो सिक्किम झरनों का प्रदेश है आप सडक से कहीं की भी थोड़ी दूरी की यात्रा कीजिये आपको किसी न किसी पहाड़ से कोई झरना गिरता जरुर दिखेगा हाँ ये जरुर हो सकता है कि आकार में जो झरने के मानक हैं वो उस पर खरा न उतरे पर पानी पहाड़ों से गिरता आपको यत्र –तत्र दिख ही जाएगा तो रिम्बी झरना बस आकार में थोडा बड़ा है इसलिए वह एक पर्यटक स्थल बन गया है पर यहाँ के पर्यटक स्थल पर आपको स्थानीय लोग नहीं दिखेंगे और न ही भीड़ भाड़ रहती है गंदगी का नामों निशाँ नहीं है हाँ और जो गंदगी दिखेगी वो बाहर से आये पर्यटकों का छोड़ा हुआ सामान होगा |मतलब आम सिक्किम का निवासी पर्यवरण के प्रति खासा जागरूक है |रिम्बी फाल्स में ऐसा कुछ नहीं था जो अनोखा हो एक झरना जो काफी उंचाई से गिर रहा था पूरा का पूरा वातावरण प्रक्रतिक था और कोई भी मानवीय ढाँचे का निर्माण वहां नहीं किया गया था |यहीं रास्ते में दरप गाँव पड़ता है जहाँ बड़ी ईलायची की खेती होती है और कई सारे होम स्टे हैं जहाँ आप घर के वातावरण में रहकर पीलिंग की खूबसूरती का आनंद ले सकते हैं और ये होटल के मुकाबले सस्ते पड़ते हैं पर होटल की लक्जरी आपको नहीं मिलेगी जो कुछ मिलेगा वो सब प्राकृतिक होगा |
सिक्किम का संतरे का बाग़ 
अब बारी थी सिक्किम का एक बाग़ देखने की थी यूँ तो बाग़ में देखने कुछ होता नहीं पर यह सिक्किम का एक संतरे का बाग़ था |घुमावदार सीढीयों में तरह -तरह के पेड़ पौधे और उनके पीछे एक पहाडी नदी कल कल बह रही थी |संतरे का मौसम न होने के कारण हमें संतरे के छोटे -छोटे कच्चे फलों को देखकर दिल को खुश करना पड़ा जो भी हो पार्क था बहुत लुभावना |
इसके और आगे एक प्रमुख झील का भी दर्शन करना था जो पहाड़ों की तलहटी में स्थित है जिसका नाम खेतोपलारी झील था |इस झील के पहुँचने का रास्ता बहुत संकरा और वीरान है अगर गाड़ियों की आवा जाही न हो तो यह कह पाना बहुत मुश्किल है कि यहाँ बौद्ध धर्म से संबंधित इतना महतवपूर्ण केंद्र होगा जो हिन्दुओं  द्वारा भी पूजनीय है ऐसा माना जाता है कि यहाँ लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं |यह झील करीब पैंतीस सौ साल पुरानी है जहाँ कुछ बौद्ध मठ हैं जहाँ पूजा हो रही थी |
खेतोपलारी झील
प्राकृतिक तौर पर यह इलाका पर्याप्त जैव विविधता लिए हुए था रास्तों और पहाड़ों पर जमी हुई काई बता रही थी कि यहाँ बारिश का पानी सूखने नहीं पाता कारण चारों तरफ ऊँचे ऊँचे पेड़ों का होना जो सूर्य की किरणों को धरती पर आने से रोक लेते हैं इसीलिये झील से मुख्य मार्ग का रास्ता जो करीब एक किलोमीटर का था ठंडा और फिसलन भरा था जबकि बाहर सूर्य अपनी तेजी के साथ विराजमान था |दोपहर के बारह चुके थे अब हमें पीलिंग वापस लौटना था और वहां से दार्जिलिंग के लिए प्रस्थान करना था |
करीब एक घंटे के बाद हम दार्जिलिंग के रास्ते में थे पीलिंग से दार्जिलिंग तक की दूरी करीब चार घंटे में पूरी होनी थी इस यात्रा के शुरू होने से पूर्व ही दार्जिलिंग में तनाव शुरू हो गया था और हम निश्चिन्त नहीं थे कि हम दार्जिलिंग पहुँच पायेंगे भी या नहीं खैर उस दिन हमें बताया गया कि दार्जिलिंग में सब ठीक थे और आप दार्जिलिंग जा सकते हैं |वैसे एक बात बताऊँ जिन्दगी में घूमने का सिलसिला बड़ी देर से शुरू हुआ पर जब से मैंने होश सम्हाला अगर कहीं जाने का मन होता था तो वह दार्जीलिंग ही था शायद इसके लिए वे हिन्दी फ़िल्में जिम्मेदार थी जो उन दिनों दूरदर्शन पर दिखाई जाती थीं तो मन बल्लियों उछल रहा था कि आखिरकार मेरे जीवन की यह अधूरी इच्छा भी पूरी होने वाली है |सिक्किम पश्चिम बंगाल द्वारा प्रशासित स्वायत्तशासी क्षेत्र है जो सिक्किम से एक दम सटा हुआ है और इस क्षेत्र के अधिकतर निवासी नेपाली मूल के हैं जोअपने लिए अलग राज्य गोरखा लैंड की मांग लम्बे समय से कर रहे हैं |सिक्किम राज्य तक को सडक बहुत अच्छी है पर जहाँ से सिक्किम खत्म होता है और पश्चिम बंगाल की सीमा शुरू होती है रास्ता वहीं से खराब होना शुरू हुआ और जिसका चरम था दार्जिलिंग से पहले के पंद्रह किलोमीटर का रास्ता उस पहाडी रास्ते में आपको सडक खोजनी पड़ेगी |
दार्जिलिंग पीस पगोड़ा
थोड़ी देर समतल इलाके में चलने के बाद एक बार फिर हमारी गाडी पहाडी पर चढ़ने लगी |आस-पास के चाय बागान बता रहे थे हम दार्जिलिंग आ चुके थे पर शहर अभी थोड़ी दूरी पर था |
यार्ड में खड़ी टॉय ट्रेन 
शहर में घुसने पर दार्जिलिंग को लेकर जो मेरे सपने थे वो धीरे धीरे ध्वस्त होने शुरू हुए |काफी गन्दा शहर लोगों और गाड़ियों से भरा हुआ जैसे गर्मियों में शिमला और मंसूरी का हाल होता है लेकिन शहर में तनाव साफ़ महसूस किया जा सकता था जगह –जगह सेना और पुलिस की मौजूदगी यह बता रही थी कि सब ठीक नहीं है |हमारा ड्राइवर जिसका नाम मैं भूल चुका हूँ दार्जिलिंग की समस्या के बारे में बता रहा था और अभी जो आग भड़की है उसके पीछे ममता बनर्जी सरकार का बंगाली भाषा को अनिवार्य बनाने का तुगलकी फैसला था पर इसी के साथ अलग राज्य की मांग भी जोर पकड़ गयी जिससे हिंसा होने लग गयी |सच बताऊँ तो दार्जिलिंग को देखकर यह अहसास हुआ कि मैं यहाँ दोबारा नहीं आना चाहूँगा |अतिक्रमण और अनाधिकृत निर्माण ने पहाड़ों को बर्बाद कर दिया है हर जगह पर्यटकों की भीड़ और गंदगी |शाम हो चुकी थी इसलिए अब आराम का वक्त था वैसे भी सुबह साढ़े तीन बजे उठकर टाइगर हिल पर सूर्योदय देखने जाने का कार्यक्रम था हालंकि मेरी इसमें कोई रूचि नहीं थी पर एक बार फिर जनमत के फैसले के आगे झुकना पड़ा |
टाइगर हिल से सूर्योदय 
सुबह साढ़े तीन बजे दार्जिलिंग में ठीक ठाक ठण्ड थी हम टाइगर हिल जाने के लिए निकल पड़े |गाड़ियों और लोगों का हुजूम धीरे –धीरे बढ़ता गया उस जगह जहाँ से सूर्योदय का नजारा किया जाना था सुबह के चार बजे एक छोटा मोटा बाजार लगा था जहाँ ऊनी कपडे बिक रहे थे और हैरत की बात है लोग खरीद भी रहे थे |कुछ युवतियां थर्मस में कॉफ़ी बेच रही थी मैंने एक कोट डाल रखा था पर ठण्ड से बचने के लिए कॉफ़ी एक अच्छा विकल्प था बीस रुपये में एक छोटे से कागज के कप में कॉफ़ी मिली जो मीठी ज्यादा थी |आसमान का माहौल देखकर मैंने अंदाजा लगा लिया आज सूरज नहीं दिखेगा क्योंकि आसमान में बादल थे तो कंचनजंघा की चोटियों में से आज सूरज के दर्शन न हो पायेंगे इसलिए मैं वहां से पहले ही खिसक लिया और मेरा यह निर्णय सही साबित हुआ क्योंकि उस दिन सूरज नहीं निकला  और हम सूर्योदय के बाद गाड़ियों की होने वाली भागम भाग और जाम से बचकर पहले निकल गए |लौटते वक्त बतासिया लूप मेमोरियल पार्क का भ्रमण किया गया |
बतासिया वार मेमोरियल :फोटो साभार गूगल 
बतासिया लूप दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे का एक स्टेशन है जहाँ एक वार मेमोरियल भी बनाया गया है जहाँ गोरखा रेजीमेंट के  उन सारे जवानों के नाम अंकित  है जो 1987 के बाद वीरगति को प्राप्त हुए |बतासिया लूप एक ऐसा स्टेशन है जहाँ रेलवे की पटरियां अंगरेजी का आठ बनाती हैं |अब कुछ बातें दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के बारे में दार्जिलिंग को विकसित करने का श्रेय अंग्रेजों  को जाता है यहाँ 1881 से नेरो गेज की ट्रेन अभी भी चलती है जिसे यूनेस्को की तरफ से वर्ल्ड हेरीटेज का दर्जा मिला है यह दो तरह के रास्ते पर चलती है पहला दार्जिलिंग से घूम स्टेशन जिसका आनंद जयादातर पर्यटक उठाते हैं इसे टॉय ट्रेन के नाम से जाना जाता है पर इसका किराया बहुत मंहगा है और दूसरा दार्जिलिंग से सिलीगुड़ी जिसमें यह ट्रेन सत्तर किलोमीटर का रास्ता यह ट्रेन करीब आठ घंटे में पूरा करती है |सडक से सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग का रास्ता बहुत अच्छा होने के कारण यह दूरी अब तीन घंटे में सिमट गयी है इसलिए लोग अब ट्रेन को प्राथमिकता नहीं देते ऐसे पर्यटक जिनके पास समय है और प्रकृति से प्यार वही अब इस ट्रेन से दार्जिलिंग तक का सफ़र तय करते हैं वैसे लम्बे समय तक यह टॉय ट्रेन मुम्बईया फिल्मों का हिस्सा रही है |आराधना फिल्म का वह मशहूर गाना “मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू” कौन भूल सकता है जो इसी ट्रेन पर शूट हुआ है |हम इस ट्रेन को चलता हुआ न देख पाए क्योंकि दार्जिलिंग में तनाव के कारण यह ट्रेन बंद थी हां यार्ड में जाकर जरुर इस ट्रेन को निहारा जो पिछले सौ सालों से भी ज्यादा दार्जिलिंग के जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बनी हुई है |
पटरियों पर सजा बाजार 
ट्रेन के मुख्य ट्रैक पर यहाँ मेक शिफ्ट अरेंजमेंट वाली कई दुकानें भी हैं जो ट्रेन के आने पर बंद हो जाती हैं और जाने के बाद फिर खुल जाती हैं |बतासिया लूप पर सस्ते उनी कपडे आप खरीद सकते हैं |
होटल लौट कर थोडा सुस्ताने के बाद हम जापान सरकार द्वारा निर्मित पीस पेगोडा देखने गये तब तक बादल पूरे दार्जिलिंग को अपने जद में ले चुके थे और ऐसे मौसम में किसी पेगोडा को देखना उसकी सार्थकता सिद्ध कर रहा था शान्ति निस्तब्धता और प्रकृति का साथ |हम उसकी खूबसूरती में खोये ही थे तभी मेरी तन्द्रा को एक बुरी खबर ने तोडा शहर में हड़ताल हो गयी हम लोगों को तुरंत होटल लौटना होगा |लौटते वक्त वो दार्जिलिंग जो भीड़ और गाड़ियों से भरा था एकदम खाली हो गया हम जल्दी से होटल पहुंचे |बंद इतना जबरदस्त था कि हमारे होटल भी ताला पड़ा हुआ था हम लोगों के पहुँचने पर गेट खुला और फिर ताला बंद हो गया |अब दार्जिलिंग घूमने का सारा कार्यक्रम मुल्तवी होकर इस पर केन्द्रित था कि सुरक्षित वापस बागडोगरा कैसे पहुंचा जाए जहाँ से हमारी उड़ान अगले दिन थी पूरी दोपहर टैक्सी के जुगाड़ में बीत गयी करते –करते शाम को पांच बजे हम लोग दार्जिलिंग से सिलीगुड़ी के लिए निकले और रात आठ बजे सिलीगुड़ी पहुँच गये |एक यात्रा अपने अंत की तरफ थी पर जिन्दगी की यात्रा और भटकन अभी भी जारी है किसी नए पड़ाव के इन्तजार में |
सिक्किम पर प्रख्यात निर्देशक सत्यजीत रे द्वारा बनाया गया वृत्तचित्र देखना चाहें तो यहाँ क्लिक करें |

 समाप्त 



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